९(२१)यज्ञ विद्या और उसका आयोजन उसके लोक कल्याण के उद्देश्य से हटकर
व्यक्तिओं के स्वार्थ का पोषण करने वाला महाभारत काल में बन गयाथा राजा लोग
युद्ध में विजय हासिल करने के लिए पापी अपने पापों को छुपाने के लिए दम्भ
और पाखंड से युक्त यज्ञ तथा कुछ लोग अपने दुश्मनो की हत्या कराने के लिए
यज्ञ कराने लगे थे ऐसा ही यज्ञ द्रुपद ने द्रोणाचार्य की हत्या कराने के
लिए किया था जिस से धृष्टद्युम्न उत्पन्न हुआ था जिसने द्रोणा चार्य को
समाधी में मार डाला था इस प्रकार यज्ञ भौतिक स्वार्थों की पूर्ति
तथा स्वर्ग प्राप्ति कराने का साधन बन गया था और उसका मोक्ष प्रदान कराने
वाला स्वरुप लुप्त हो गया था यज्ञ का विधिवत अनुष्ठान करने वाले अपने
पुण्योँ से विशाल भोग युक्त स्वर्ग की प्राप्ति करते थे और जब स्वर्ग के
सुख भोगने से उनके पुण्य समाप्त हो जाते थे तब पुनः स्वर्ग से पतित होकर
संसार में जन्म ले लेते थे यह स्वर्ग प्राप्ति उनको होती थी जो भोगों की
प्राप्ति के लिए तीनों वेदों में कहे सकाम धर्म का आश्रय लेकर विधि विधान
से यज्ञ का अनुष्ठान करते थे आज कल भी बहुत से यज्ञ होते दिखाई देते हैं
किन्तु उनमे विधि विधान का पालन प्रायः नहीं होता है हवन सामग्री यज्ञ के
अनुकूल नहीं होती है घृत भी शुद्ध नहीं होता है मन्त्रों का उच्चारण भी
अशुद्ध होता है और कभी कभी तो यज्ञ में हादशा होजाते है जिसमे यज्ञ करने
वाले लोगों की मृत्यु भी हो जाती है यज्ञ का विकृत तामसी स्वरुप ही आजकल
दिखाई देता है लोगों ने बहुत से कल्पित यज्ञ करना शुरू कर दिए हैं जिनकी
बुद्धि शुद्ध नहीं है बे भी समाचारों में बने रहने के लिए बुद्धि शुद्धि
यज्ञ करते दिखाई देते हैं यज्ञ करने वालों को ऐसे परमात्मा का अपमान कराने
वाले यज्ञ से बचना चाहिए
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