Wednesday, 27 January 2016

१(४६)यदिमाम्प्रतीकारम अशस्त्रं शस्त्रपाणयः ---------------अगर ये शास्त्र लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र और उनके पक्छपाती राजा लोग युद्ध भूमि में सामना न करने वाले मुझे मर भी दें तो भी वह मेरे लिए बड़ा ही हितकारक होगा !गीता में भगवान का उपदेश समस्त प्राणियों को आसक्ति मूढ़ता और मोह निरसन के लिए ही हुआ है !युद्ध में प्रबृत्त कराने या छोड़ देना के लिए नहीं  हुआ है !युद्ध करने का निर्णय तो खुद अर्जुन का था !युद्ध अर्जुन को कर्तव्य रूप में प्राप्त हुआ था !और अब वह आसक्ति के कारण अपने कर्त्तव्य को त्याग रहा है !यह कर्तव्य ना करने की प्रवृत्ति देश समाज और व्यक्ति का पतन करने वाली होती है !इसीलिए कर्त्तव्य चाहे युद्ध करने का हो या व्योपार या राजनीति या सरकारी सेवा ,चिकित्सा या शिक्छण कार्य या न्याय कार्य  आदि करने का हो भीषण से  भीषण  परिस्थिति  में भी व्यक्ति को अपने कर्तव्य  का पालन करना चाहिए !यही बात गीता में विशेष तौर पर बतायी गयी है !मनुष्यों को  भुक्ति और  ,मुक्ति सब कर्त्तव्य पालन से ही प्राप्ति होती है !जब अर्जुन कैसे व्यक्ति भी मोह मूढ़ता और स्वजनाशक्ति से कर्तव्य से  पलायन करने लगते हैं !तब देश और समाज तथा व्यक्ति के नैतिक पतन कोरोका नहीं जा सकता है ! अर्जुन जैसे  विद्वान और अपने कर्तव्यछेत्र में निपुण और प्रशिक्छित व्यक्ति मूढ़ता ,मोह और स्वजनाशक्ति से कर्तव्य  विमुख होने की चेष्टा करते हैं !तो बे अपना सब ज्ञान विज्ञान कर्त्तव्य त्याग के समर्थन और अनुमोदन में लगादेते हैं !यह बात अर्जुन के यहाँ दिये गए तर्कों  से सिद्ध होती  है ! अर्जुन यहाँ अपने दिए गए कथन से अपने पूर्व में दिए गए कथनो  को झूठा सिद्ध कर रहा है !
!जब पांडवों को गुप्तचरों द्वारा यह समाचार प्राप्तहुआ था! कि दुर्योधन ने भीष्मपितामह से पूंछा था कि आप पांडवों की सेना को युद्ध में कितने दिनों में मार सकते हैं ! तब भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य ने कहा था कि बे पांडवों की संपूर्ण सेना का संघार एक माह में कर सकते हैं 1 कृपाचार्य ने दो महीने का और अश्वत्थामा  ने दस ही दिनों में पांडव सेना को मार देने की बात कही थी ! कर्ण ने कहा था कि वह पांडव सेना को मात्र पांच दिनों में ही समाप्त कर सकता है! तब  युधिस्ठर ने अर्जुन से पूंछा था कि में भी तुम्हारी बात सुनना चाहता हूँ कि तुम कितने समय में शत्रुओं की सेना का संघार कर सकते हो !अर्जुन का उत्तर था ! मै जो सत्य बात कह रहा हूँ उस पर ध्यान दीजिये ! मेँ भगवान श्री कृष्ण की सहायता से युक्त हुआ एक मात्र रथ को लेकर ही देवताओं सहित तीनों लोकों संपूर्ण चराचर प्राणियों तथा संपूर्ण कौरव सेना को भीष्म ,द्रोणाचार्य ,कर्ण कृपाचार्य आदि को  भी पलक मारते मारते ही  नष्ट कर सकता हूँ ऐसा मेरा विश्वास है ! भगवान शंकर का दिया हुआ पशुपति शस्त्र मेरे पास है ! जो प्रलयकाल के समान समस्त प्राणियों का नाश कर सकता है ! इसे ना तो भीष्म जानते हैं 1 और न इसका पता द्रोणाचार्य करण कृपाचार्य और अश्वत्थामा  आदि वीरों को ही है !वही अर्जुन यहाँ मोह मूढ़ता और स्वजनाशक्ति से ग्रस्त होकर कर्त्तव्य त्याग के समर्थन में यह बात कह रहा है !अगर में अश्त्र शस्त्र त्याग कर निहत्था अवस्था मेँ हो जाऊं  और फिर भी धृतराष्ट्र  केपुत्र मेरा बध कर दें ! तो यह भी मेरे लिए हितकर है !यह अर्जुन नहीं बोलरहा है !उसकी मूढता और स्वजनाशक्ति बोलरही है !आसक्ति महान पुरुषों को भी कितने नीचे स्टार तक गिरा सकती है !अर्जुन का यह कथन इसका उदाहरण है ! 




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