Saturday, 16 January 2016

१(३१)निमत्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ------------हे कृष्णा में शकुनों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ और युद्ध में स्वजनो को मार कर लाभ भी नहीं देख रहा हूँ इन दोनों बातों से अर्जुन यह कह रहे हैं कि में शकुनों पर विचार करके देखूं या स्वयं विचार करके देखूं दोनों ही प्रकार से युद्ध का आरम्भ और परिणाम हमारे लिए और संसार मात्र के लिए हितकारक नहीं दिखाई देता है  !महाभारत काल में शकुनों से ही कर्म के परिणामों की और कर्मो की पूर्व भूमिका का ज्ञान लोग करते थे !जब दुर्योधन का जन्म हुआ था तब जन्मते ही वह गधे की रकने सी आवाज में रोने लगा था उसके रोने की आवाज सुनकर दूसरे गधे भी रेंकने लगे थे गीध गीदड़ और कोाये भी कोलाहल करने लगे थे बड़े जोर की अंधी चलने लगी थी राजा धृष्ट रास्त्र भी भय से पीड़ित हो गए थे तब उन्होंने ब्राह्मणो को भीष्म और विदुर को तथा समस्त कुरुवंशियों को बुलाके कहा था हमारे कुल की कीर्ति बढ़ाने वाले राजकुमार युधिस्ठर सबसे ज्येष्ठ हैं बे अपने गुणों से राज्य के पाने के अधिकारी है किन्तु उनके बाद यह मेरा पुत्र दुर्योधन ही ज्येष्ठ है क्या यह भी राजा बन सकेगा धृतराष्ट्र की यह बात समाप्त होते ही चारों दिशाओं में भयंकर मासाहारी जीव गर्जना करने लगे थे और गीदड़ अमंगल सूचक बोली बोलने लगे थे सब और उन भयानक अपशकुनों को देखकर विदुर ने कहा था कि आप के ज्येष्ठा पुत्र के जन्म लेने पर जिस प्रकार से  ये भयंकर अपशकुन प्रगट हो रहे हैं उनसे स्पष्ट जान पड़ता है की आपका यह पुत्र समूचे कुल का संघार करने वाला होगा ! यदि इसका त्याग कर दिया जाय तो सब विघ्नो की शांति हो जायेगी ! और यदि इसकी रक्छा की गयी तो आगे चल कर बड़ा भरी उपद्रव खड़ा होगा  !महीपते आपके निन्नयाबे पुत्र ही रहें ! यदि आप अपने कुल की शांति चाहते हैं तो इस एक पुत्र को त्याग दें ! केवल एक पुत्र के त्याग द्वारा इस सम्पूर्ण कुल का तथा समस्त जगत का कल्याण कीजिये ! नीति कहती है कि समूचे कुल के  हित के लिए  एक व्यक्ति को त्याग दें ! गाओं के हित के लिए एक कुल का त्याग कर दें  !और देश के हित के लिए एक गाओं का परित्याग कर दें ! और आत्मा के कल्याण के लिए सारे भूमण्डल को त्याग दें ! विदुर और सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणो के इस प्रकार कहने पर भी पुत्र स्नेह के आसक्ति पूर्ण बंधन में बंधे धृत राष्ट्र ने दुर्योधन का त्याग नहीं किया था ! परिणाम स्वरुप महाविनाश हुआ !वेद व्यास ने भी धृत राष्ट्र से अमंगल सूचक भयानक उत्पातों और शकुनों को बताते हुए ! धृतराष्ट्र से कहा था कि तुम्हारे पुत्रों और अन्य राजाओं का मृत्युकाल आ पहुंचा है ! बे काल के अधीन होकर जब नष्ट होने लगें ! तब इसे काल का चक्क्र समझ कर मन में शोक ना करना ! यदि संग्राम भूमि में तुम इन सबकी अवस्था देखना चाहो तो तुम्हें में दिव्यनेत्र प्रदान करूँ ! फिर तुम यहाँ बैठे ही बैठे वहां होने वाले युद्ध का सारा दृश्य अपनी आँखों से देख सकोगे ! धृतराष्ट्र ने कहा ब्रह्मऋषि प्रवर में अपने कुटुम्बीजनों का वध नहीं देखना चाहत हूँ ! परन्तु आपके प्रभाव से इस युद्ध का वृतान्त अवश्य सुनना चाहत हूँ  !तब व्यास जी ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान कर दी थी ! व्यासजी ने कहा  इस युद्ध में भयानक नरसंघार होगा ! क्योंकि मुझे इस समय ऐसे ही भयानक अपशकुन दिखाई दे रहे हैं ! बाज ,गीध ,कौए ,कंक और बगुले ब्रक्छों के अग्र भाग पर बैठते तथा अपने समूह एकत्रित करते हैं ! ये पक्छी अत्यंत आनंदित हो कर युद्धस्थल को बहुत निकट से जाकर देखते हैं ! इस से सूचित होता है कि ये मॉस भक्छी पशु पक्छी आदि प्राणी हाथियों ,घोड़ों आदि का मास खाएंगे ! प्रातः और सांयम् उदय और अस्त की बेला में सूर्य देओ कबन्धों से घिरे दीखते हैं ! कार्तिक की पूर्णिमा को कमल के समान नीलवर्ण के आकाश में चन्द्रमा प्रभा हीन होने का कारण दृष्टि गोचर नहीं हो पाटा है ! इसका फल यह है कि बहुत से शूरवीर नरेश तथा राजकुमार मारे जाकर पृथ्वी को आच्छादित करके रणभूमि में शयन करेंगे ! शनिश्चर नामक गृह रोहिणी को पीड़ा देता हुआ खड़ा है ! चन्द्रमा का चिन्ह मिट सा गया है  !इस से सूचित होता  है कि भविष्य में महान भय की प्राप्ति होगी !इत्यादि युद्ध सूचक अपशकुनों का वर्णन व्यास देव ने किया है !   

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