Saturday, 9 January 2016

गीता ज्ञान १(१४,१५,१६)ततः श्वेते  हये युक्तेः ------भीष्म आदि के शंख बजाने के बाद सफ़ेद घोङो से युक्त महान रथ पर बैठे हुए भगवान श्री कृष्णा और अर्जुन ने भी दिव्य शंख बड़े जोर से बजाये ! भगवान श्री कृष्णा ने पाञ्चजन्य नामक तथा अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाया ! युधिस्ठर ने अनंत विजय और भयानक कर्म करने वाले भीम ने पौण्ड्र नामक शंख  तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष मणिपुष्पक नाम के शंख बजाये  !अर्जुन को अनेकानेक दिव्य शक्तियां प्राप्त थी ! जिस महान रथ पर अर्जुन और भगवान श्री कृष्णा बैठे हुए थे वह रथ वरुण ने अर्जुन को दिया था ! उसमे जुते हुए अश्वों का रंग चांदी के सामान सफ़ेद था ! बे सभी घोड़े गन्धर्व देश में उत्पन्न तथा सोने की मालाओं से विभूषित थे ! उस रथ की ध्वजा पर एक श्रेष्ठ कपि बैठा हुआ था ! उन घोड़ों की कांति सफ़ेद बादलों सी जान पड़ती थी ! बे वेग में मन और वायु की समानता करते थे ! वह रथ संपूर्ण आवश्यक वस्तुओं से युक्त था ! तथा देवताओं और दानवों के लिए भी अजेय था ! मयासुर ने अर्जुन को देवदत्त नमक शंख प्रदान किया था ! वह शंख जल के देवता वरुण देव का था ! जो बजाने पर बड़ी भारी आवाज करता था ! उस शंख की आवाज सुनके समस्त प्राणी काँप उठते थे ! विजली की गड़गड़ाहट के समान पाञ्चजन्य का गंभीर घोष सुनकर सब और फैले हुए समस्त पांडव सैनिक हर्ष से उल्लसित एवं रोमांचित हो उठे  !शंखों  की ध्वनि से मिला हुआ बेगवान् वीरों का निनाद पृथ्वी आकाश तथा समुद्रों तक फेल कर उस सबको प्रितिध्वनित करने लगा ! भगवान ने पाञ्चजन्य नामक शंख शंख रूप धारी दैत्य को मारकर उसको शंख के रूप में ग्रहण किया था अर्जुन के पास जो देवदत्त नमक शंख  था उसके  सम्बन्ध में यह भी कहा जाता है कि वह शंख उनको  इन्द्र ने दिया था ! चित्र रथ गंधर्व ने भी अर्जुन को १०० दिव्य घोड़े दिए थे  !इन घोड़ों की यह विशेषता थी की इनमे से युद्ध में कितने ही घोड़े क्यों ना मारे जाएँ पर ये संख्या में १०० के १०० ही रहते थे ! बे  पृथ्वी स्वर्ग आदि सभी स्थानो पर जा सकते थे  !इन्ही १०० घोड़ों में से ४ सफ़ेद घोड़े अर्जुन के रथ में जुते हुए थे ! भीम को भीम कर्मा इसीलिए कहा जाता था क्योँकि वह युद्ध छेत्र में अत्यंत भयानक ढंग से युद्ध करते थे ! उन्होंने ही धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों का अकेले ही बध किया था तथा उन्होंने हिडिम्ब ,किर्मीर बकासुर ,,जटासुर ,आदि असुरोँ और जरासंध कीचक आदि बलवान वीरों को भी मारा था ! जब पांडव छिपे रूप में भिक्छा मांग कर अपना जीवन यापन कर रहे थे ! तब उनको भिक्छा में जो अन्न प्राप्त होता था ! उसमे से आधा भीम खाते थे और आधा शेष चारों भाई और कुंती खाती थी ! उनके पेट में ब्रक नामकी एक विशेष अग्नि थी जिस से बहुत अधिक अन्न पचता था ! इस कारण उनका नाम बृकोदर पड़ गया था ! ऐसे बृकोदर भीमकर्मा भीम ने बड़े आकार वाला पौण्ड्र नामक शंख बजाया ! युधिस्ठर ने अनंत विजय नामक शंख तथा नकुल और सहदेव न सुघोष मणि पुष्पक नामक शंख बजाये ! आचार्य विनोबा भावे न भगवान श्री कृष्णा के पाञ्चजन्य नमक शंख की व्याख्या करते हुए कहा है कि भगवान की आवाज पंचजनो की कल्याण की इक्छा से प्रेरित है ! और भक्त की आवाज भगवान की कृपा प्रसाद की देन है ! इसीलिए भगवान श्री कृष्णा की शंख का नाम पाञ्चजन्य और भक्त अर्जुन की शंख का नाम देवदत्त है ! इसी प्रकार से युधिस्ठर द्वारा बजाये गए अनन्तविजय नाम की शंख की व्याख्या इस रूप में भी  की जा सकती है कि युधिस्ठर धर्म राज हैं ! और जो धर्म पर आरुढ़ है  उसकी पराजय कभी  हो ही नहीं सकती है ! इसीलिएउनके शंख का नाम अनन्तविजय है ! भीम की शंख का नाम पौण्ड्र है जो आकार में सबसे अधिक विशाल है ! क्योँकि भीम की सभी कर्म भयानक हैं ! नकुल,और  सहदेव के शंख सुघोष मणि पुष्पक है ! जो अपने नाम की अनुकूल आकृति में सौम्य है ! बे नकुल की बुद्धिमत्ता और सहदेव की सुंदरता को दर्शाते हैं !

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