वेदिकधर्म में काल को ४ युगोँ में विभाजन सतयुग त्रेता द्वापर और कलयुग
के रूप में किया गया है तथा इन युगोँ की आयु और इन युगों में जन्म लेने
वाले स्त्री पुरुषों की आयु गुण धर्म आदि भी बताये गए हैं इस समय कलयुग चल
रहा है इसलिए इस युग में जन्मे मनुष्योँ के आचार विचार व्योहार आदि पर
ध्यान देते हुए ही हमें साधु संतों सन्यासिओं समाज सेबिओं राजनेताओं
अध्यापकों तथा सभी प्रकार के मनुष्योँ के आचरणों पर बुद्धि पूर्वक विचार
कर अपनी राय निर्धारित करनी चाहिए जिस प्रकार से आज मन का निग्रह करना
इन्द्रिओं का वष में करना धर्म पालन के लिए कष्ट सहना बाहर भीतर से शुद्ध
रहना दूसरों के अपराधोँ को छमा करना शरीर मन आदि में सरलता रखना वेद
शास्त्र आदि का ज्ञान रखना यज्ञ विधि को अनुभव में लाना और परमात्मा वेद
आदि में आस्तिक भाव रखने वाले ब्राह्मण समाज में बिरले ही हैं इसी प्रकार
शूरवीरता तेज धैर्य शासन करने आदि की विशेष चतुरता युद्ध में कभी पीठ न
दिखाना दान करना तथा शासन करने का भाव रखने वाले छत्री भी नहीं है गाय की
रक्षा और खेती करने वाले वैश्य भी नहीं है वे सिर्फ खरीदने बेचने का
व्यबसाय करते हैं और सरकारी नौकरी के द्वारा वेतन प्राप्त कर तथा शासन
व्यबस्था चलाने वाले सेवा भावी सूद्र भी नहीं है इस प्रकार से पूर्व में
प्रचलित वर्ण व्यबस्था पूरी तरह से समाप्त हो गयी है कलियुग में यह होता
ही है इसलिए इस युग में वर्ण धर्म के स्थान पर भगवान भागवत धर्म की स्थापना
करते है अर्थात धार्मिक व्यक्ति की पहिचान आचरण से की जाती है वर्ण या
जाति से नहीं इसलिए इस युग में जिनमे ब्राह्मणो के गुण धर्म होते है तथा जो
राजनेता या समाज सेवी तन मन धन से निस्वार्थ भाव से जनसेवा करते हैं और
जो इस मरणशील संसार को अपने सुख भोग का साधन न बनाकर दुखमय मानकर लोकसेवा
के लिए अपना जीवन अर्पित कर निष्काम भाव से ईश्वर की उपासना करते है वही
सच्चे आस्तिक और ईश्वर भक्त होते हैं और परमात्मा के धाम को प्राप्त करते
हैं यही भगवान की आज्ञा
No comments:
Post a Comment