Monday, 11 January 2016

९(१५,१६)वैदिक धर्म में साधकों को उनकी रूचि श्रद्धा विश्वास और योग्यता के अनुसार भगवान की उपासना पूजा अर्चा करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है परमात्मा एक है किन्तु उपासना की विधियां अनेक हैं इसलिए कुछ साधक भगवान को और अपनी आत्मा को एक मान कर भगवान की अभेद भाव से उपासना करते हैं दूसरे कई भक्त परमात्मा को अपने से पृथक मान कर चारों तरफ मुखवाले भगवन के विराट रूपकी अर्थात संसार को ही परमात्मा का विराट रूप मान कर संसार की सेवा को ही परमात्मा की पूजा मान कर भक्ति भाव से संसार की सेवा अनेक प्रकार से करते हैं इस प्रकार भक्त अपने आप को सेवक और भगवान को सेव्य मानकरतथा सभी पदार्थो को पूजा की सामग्री मान कर कार्य कारण रूप से स्थूल सूक्छम रूप से जो कुछ देखने सुनने समझने और मानने में आता है वह सब केवल भगवान ही है कृतु, यज्ञ, स्वधा, ओषधि, मन्त्र, घृत ,अग्नि, और हबन रूप क्रिया भी भगवान ही हैं अर्थात भक्त सेवक भगवान सेव्य और जो कुछ भी बस्तु रूप में सामग्री है वह सब पूजा के दृव्य है इस प्रकार से यह पूजा कार्य भक्त का जीवन भर चलता रहता है

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