१(३६,३७) निहत्य धार्तराष्ट्रानाः का प्रीति जनार्दन-------- हे कृष्ण इन धृतराष्ट्र के पुत्रों और साथियों तथा सम्बन्धियों को मार कर हम लोगों को क्या लाभ होगा ? इन आततायियों को मारने से तो हमें पाप ही लगेगा ! आतताइयों को दण्डित करने के लिए ही कानून बनाये जाते हैं !और उनको कानून के अंतर्गत दण्डित करना यह राजा का प्रमुख कर्तव्य होता है !अर्जुन यहाँ मोह के कारण उत्पान्न मूढ़ता का कारण आतताइयों को दण्डित करना भी पाप बता रहा है !महाभारत कल में आततायी छै प्रकार के माने जाते थे ! आग लगाने वाला ,विष देने वाला ,हाथ में अश्त्र लेकर मारने को तैयार व्यक्ति ,धन का बलपूर्वक हरण करने वाला ,जमीन छीनने वाला और स्त्री का अपहरण करने वाला ! इनको दण्डित करने से राजधर्म का निर्बहन और पुण्य की प्राप्ति होती थी ! इसीलिए अपने वान्धव इन धृतराष्ट्र के सम्बन्धियों को युद्ध में मारना में उचित नहीं मानता हूँ !क्योँकि अपने कुटुम्बियों को मार कर हम कैसे सुखी होंगे ? ये हमारे घनिष्ठ सम्बन्धी है ! यह मोह अर्जुन में अचानक उत्पन्न हुआ है ! जिसके कारण अपने छत्रियोचित कर्तव्य की तरफ से अर्जुन का ध्यान हट गया है जहाँ मोह होता है ! वहां मनुष्य का विवेक दब जाता है ! विवेक के दबने से मोह की प्रबलता बढ़ जाती है ! और मोह के प्रबल होने से कर्तव्यभाव लुप्त हो जाता है ! यही इस्थिति यहाँ अर्जुन की हो गयी है ! उसका छात्र धर्म के साथ राज धर्म का भी ज्ञान नष्ट हो गया है ! और वह अपने पूर्व में दिये गए कथनो और आश्वासनों को भी भूल गया है ! द्रौपदी ने अर्जुन भीम आदि से और भगवान श्री कृष्ण से अपनी ह्रदय विदीर्ण कर देने वाले दुःख को बताते हुए कहा था -----मेरी जैसी स्त्री जो कुन्तीपुत्रों की पत्नी, आपकी सखी और धृष्टद्युम्न जैसे वीर की बहन होने के बाद भी क्या किसी तरह राजसभा में केश पकड़ कर घसीट कर लाई जानी चाहिए थी ? में रजस्वला थी ! मेरे कपड़ों पर खून के छींटे लगे थे ! मेरे शरीर पर एक ही वस्त्र था ! और में लज्जा और भय से थर थर काँप रही थी ! उसदाशा में मुझे कौरव सभा में बाल पकड़ कर घसीटते हुए लाया गया था ! पांडवों ,पांचालों और वृष्णि वंशी वीरों के जीतेजी धृतराष्ट्र के पुत्रों ने मुझे दासी कहकर मुझे भोगने की इक्छा प्रगट की थी ! मै धर्मतः भीष्म और धृतराष्ट्र दोनों की पुत्र बधू हूँ ! तो भी उनके सामने ही अपमानित की गयी थी ! भीमसेन के बल को धिक्कार है ! अर्जुन के गांडीव धनुष को भी धिक्कार है ! जो उन नराधमों द्वारा अपमानित होती हुई देख कर भी सहन करते रहे ! यह धर्म का सनातन मार्ग है कि निर्बल पति भी अपनी पत्नी की रक्छा करते हैं ! मेरे लिए न पति हैं ना पुत्र हैं न बांधव हैं और न भाई हैं ना पिता हैं और ना ही आप मेरी रक्छा कर रहे हैं ! क्योंकि आप सब लोग नीच मनुष्यों द्वारा जो मेरा अपमान हुआ था उसकी उपेक्छा कर रहे हैं ! मानो उनके दुष्क्रत्य के लिए आपके दिल में जरा भी दुःख नहीं है ! उस समय करण ने जो मेरी हंसी उड़ाई थी ! उसने मुझे कौरव सभा में वैश्या कहा था ! उस से उत्पान्न हुई मर्मान्तक पीढ़ा मेरे अन्तस्थल में शूल की तरह चुभ रही है ! श्री कृष्ण चार कारणों से आपको सदा मेरी रक्छा करनी चाहिए ! एक तो आप मेरे सम्बन्धी हैं ,दूसरे अग्निकुंड से उत्पन्न होने के कारण में गौरव शालिनी हूँ तीसरे आपकी सखी हूँ और चौथे आप मेरी रक्छा करने में समर्थ हैं ! श्रीकृष्ण ने अर्जुन भीम आदि की उपस्थित में यह कहा था ! द्रौपदी तुम जिन पर क्रुद्ध हुई हो उनकी स्त्रियां भी अपने पतियों को अर्जुन के वाणो से छिन्न भिन्न और खून से लथ पथ हो मरकर धरती पर पड़ा देख इसी प्रकार विलाप करेंगी ! मै सत्य प्रतिज्ञा पूर्वक कह रहा हूँ कि तुम राज रानी बनोगी ! द्रौपदी ने भगवान श्री कृष्ण के मुख से ऐसी बातें सुनकर अर्जुन की ओर देखा ! तब अर्जुन ने द्रौपदी से कहा था ! लालिमा युक्त सुन्दर नेत्रों वाली देवी तुम विलाप मत करो भगवान श्री कृष्ण जो कुछ कह रहे हैं वह अवश्य होकर रहेगा टल नहीं सकता है ! यहाँ अर्जुन मोह और स्वजनासक्ति के कारण बदली हुई भाषा बोल रहा है !आसक्ति का निरसन ही गीता का मख्य ध्येयहै !परिस्थिति कैसी भी हो कर्तव्य कर्म का निष्पादन तो होना ही चाहिए !कर्तव्य का जब निष्ठां पूर्वक पालन समाज में नहीं होता है !तब कर्म संकरता समाज में व्याप्तहो जाती है !और लोग कर्तव्य भ्रष्ट होकर आदर्श की बातें करने लगते हैं !महाभारत का प्रसंग मात्र परिवार का युद्ध नहीं था !यह राजधर्म और कर्त्तव्य पालन का उदाहरण था !मोह ग्रस्त व्यक्ति परिवार प्रेम आदि की चद्दर ओढ़कर राजधर्म और कर्त्तव्य निष्ठां का विनाश कर देते हैं !फिर यह कर्तव्य भ्रष्टता का जहर संपूर्ण समाज में फेल जाता है !जैस आजकल देश और समाज में फैला हुआ है !आदर्श व्याख्यानों की चद्दर तले घनघोर कर्तव्य भ्रस्टता क्रियाशील है !
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