गीता
९(३४)मन बड़ा ही चंचल प्रमथन शील जिद्दी और सभी इन्द्रियोँ से अधिक बलवान
होता है उसको बस में करना वैसा ही असंभव है जैसे वायु को रोकना जीवात्मा
मन का आश्रय लेकर ही कान नेत्र ,त्वचा रसना और नाक इन पांचों इन्द्रिओं के
द्वारा भोगों का सेवन करता है इसलिए सबसे पहले मन को विषय भोग से हटाकर
परमात्मा की साधना में केन्द्रित करना पड़ता है जब तक मन सांसारिक पदार्थों
के भोग में लगा हुआ है तबतक आसक्ति युक्त मन परमात्मा की भक्ति नहीं कर
सकता है इसलिए मन को ईश्वर के ध्यान अर्चा उपासना पूजा
से ईश्वर में लगाना पड़ता है तब मन परमात्मा की भक्ति में लगने लगता है और
परमात्मा की पूजा में मन अनुरक्त हो जाता है और फिर उसका आश्रयस्थल संसार
ना होकर परमात्मा हो जाता है और भक्त परमात्मा की श्रेष्ठता का अनुभव कर
परमात्मा की शरण ग्रहण कर लेता है तात्पर्य यह है की संसार के संबंधों के
बजाय परमात्मा को ही नमस्कार करने लगता है जब तन मन परमात्मा की महत्ता और
भक्ति से युक्त हो जाता है तब परमात्मा की महिमा का अनुभव उसे जीवित
अवस्था में ही जाता है और अंतकाल में वह भक्त परमात्मा के धाम को प्राप्त
हो जाता है यह भक्ति की ही महिमा है की भगवान की भक्ति से वर्तमान जीवन
में भगवान की महिमा का दर्शन और मृत्यु के बाद भगवान के लोक की प्राप्ति हो
जाती है किन्तु संसारिक भोगों को स्थायी बनाने की कितनी भी चेस्टा की जाय
वह आज तक किसी की भी पूरी नहीं हुई और ना होगी क्योँकि संसार में स्वाभाविक
संयोग वियोग होता रहता है
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