Tuesday, 12 January 2016

काशी अनादिकाल से शीर्ष विद्वानो की नगरी रही है !शव्दिक ज्ञान और अनुभवजन्य ज्ञान का सही प्रमाणपत्र इसी नगरी से प्राप्त अनादिकाल से होता रहा है !शंकराचार्य और मंडन  मिश्रा का और स्वामी दयानंद और विशुद्धानन्द आदि सहित अनेक ऋषियों महर्षियों और ज्ञानियों के शाश्त्रार्थ इसी पवित्र भूमिमें हुए हैं !यहीं पर गांधीजी का १९१५ में बनारस हिन्दू  विश्वविद्यालय के प्रांगण में तत्कालीन वायसरॉय हार्डिंग्ज की उपस्थिति   में ऐतहासिक भासण हुआ था !विवेकानंद का भी यहाँ आगमन एक से अनेकबार हुआ !विवेकानंद १४ साल तक नंगे पैर एक अज्ञात सन्यासी के रूप में सम्पूर्ण भारत में भ्रमण करते रहे थे !इस भ्रमण के दौरान उनको भारत की दरिद्रता और आध्यात्मिक विपुलता का भी दर्शन हुआ !और धर्म में व्याप्त ढोँग और पाखंड का भी अनुभव हुआ था !इसी भ्रमण के दौरान उन्हें पावहारी ऋषि के भी दर्शन हुए !और इसी आध्यात्मिक शक्ति का दर्शन उन्होंने अमेरिका में विश्व धर्म सम्मलेन में सभी धर्मों के आचार्यों को कराया था !और महत्ता प्राप्त की थी !१८९३ में विवेकानंद आध्यात्मिक धारा को प्रवाहित करने के लिए अमेरिका गए थे !बे पश्चिम के विज्ञान से भारत के आध्यात्मिक ज्ञान का समन्वय स्थापित करना चाहते  थे !पश्चिम भौतिक ज्ञान के कारण प्राप्त भौतिक समृद्धि के अतिशय और अवांछनीय भोगों के कारण  अशांत था और भारत दरिद्रता  से पीड़ित था !बे चाहते थे कि पश्चिम भारत से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर शांति प्राप्त करे ! और भारत पश्चिम के विज्ञान से दरिद्रता का निवारण करे !विवेकानंद की डगर आसान नहीं थी !उनको अपने ही देश वासियों की ईर्ष्या  का शिकार होना पड़ा था !उन्होंने अपने एक पत्र में लिखा था की प्रत्येक भारतबासी को अपने जीवन से गुणों में दोष देखने की बृत्ति को निकाल कर फेंक देना चाहिए  और ईर्ष्या का त्याग कर देना चाहिए !और जहाँ कहींभी अच्छे कर्म हो रहे हों उनका सहयोग करना चाहिए !महान बन ने के ये तीन गुण व्यक्तियों और राष्ट्र के लिए सामान रूप से उपयोगी हैं !जिस प्रकार मातृ सुख की प्राप्ति के लिए महिलाओं को ९ महीने गर्भ धारण के कष्ट को उठाना पड़ता है !उसी प्रकार से विवेकानंद के द्वारा आचरित जीवन चर्या के लिए अपनी मन बुद्धि और चित्त को आत्मसंयम के द्ववारा नियंत्रित और परिवर्तित तथा परिवर्द्धित करना पड़ता है ! तथा अहंकार दर्प और अभिमान से मुक्त होना पड़ता है ! अमेरिका जाने के पहले उनका नाम विदिविशानन्द था ! जिसका अर्थ होता है जो अभी मार्ग में है !यह नाम राजस्थान की रियासत खेतड़ी के शाशक ने जो विवेकानंद के समर्पित भक्त थे !ने बदलबाया था !और विवेकानंद का नाम धारण किया था ! विवेकानंद का जीवन काफी कठिनाइयों के दौर से गुजरा था जिसका जिक्र उन्होंने अपने कई पत्रों में किया है !

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