गीता १(९)अन्ये च बहबः शूरा -------भीष्म द्रोणाचार्य करण आदि के अतिरिक्त और भी बहुत से शूर दुर्योधन की सेना में थे ! जो अनेक प्रकार के अश्त्र शस्त्रों के संचालन में परिपक्व थे ! तथा जो दुर्योधन के लिए अपने जीवन को युद्ध में बलदान करने के लिए कृत संकल्प थे यह बात दुर्योधन ने द्रोण चार्य से कही ! दुर्योधन की सेना में रथी, महारथी लाखों की संख्या में थे ! उसके सभी भाई दुशासन आदि अश्त्र शस्त्र और बाण विद्या के ज्ञाता और द्रोणाचार्य तथा कृपाचार्य के योग्य शिष्य थे ! भोजबंशी कृतवर्मा ,मद्र राज शल्य ,सिन्धुराज जयद्रथ ,काम्बोज देश के राजा सुदक्छिण महिषमतीपुरी के राजा नील ,अवन्ति देश के दोनों राजकुमार बिन्द अनुबिंद त्रिगर्त देश के पांचो भाई सत्यरथ आदि !दुर्योधन का पुत्र लक्छ्मण कौशल देश के राजा बृहद्दल दुर्योधन के मामा गांधार देश का राजा शकुनि करण का पुत्र बृष सेन क्रूर कर्मा राक्छस अलमबसु प्रागज्योतिषपुर नरेश भगदत्त आदि प्रमुख योद्धा थे दुर्योधन की विसालसेना सभी प्रकार से संख्या बल और शस्त्र बल में पांडवों की सेना से सबल और बड़ी थी !उसमे दिव्य अश्त्र शस्त्रों से सज्ज भीष्म द्रोण करण कृपाचार्य अश्वत्थामा आदि कभी और किसी से भी पराजित ना होने वाले योद्धा भी थे !और शस्त्र संचालन में कुशल तथा मायावी विद्या से युद्ध करने वाले वरदानी जय द्रथ, भगदत्त, शल्य ऐसे महारथी भी थे !दुर्योधन के साथ भारत की एक तिहाई राज्य शक्ति थी !
दुर्योधन कहता है !ये सभी लोग मेरे लिए अपने जीवन को बलिदान करने केलिए युद्ध भूमि में एकत्रित हुए हैं !सभी देशों में कालचक्र के कारण ऐसा समय आता है !जब सदाचार परायण सद्गुणी लोग भी इन दुष्ट स्वार्थी और भोगी प्रवृत्तियों के बाहक और पोषण करने वालों के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं !सदाचारी लोग परम्परा और मर्यादा का पालन स्वभाव बस करते हैं !और भोगी स्वार्थी क्रूर और नृशंश पुरुष मर्यादाओं का उपयोग अपने निकृष्ट स्वार्थों की तृप्ति के लिए करते हैं!
1 यही स्थिति उस युग के महान ज्ञानी सद्गुण संपन्न भीष्म और द्रोणाचार्य आदि के समक्छ उत्पन्न हो गयी थे !इन लोगों ने राज्य का नमक खाया था इसीलिए ये राज्य भक्ति से बंध कर दुर्योधन का साथ दे रहे थे !किन्तु ह्रदय से धर्मात्मा पांडवों के साथ थे !जब इस तरह का विचित्र संयोग समाज में निर्मित हो जाता है !सदाचार को कदाचार का माध्यम बना लिया जाता है !तब महाभारत का बीजारोपण प्रारम्भ हो जाता है !जब स्वार्थी लोग सदाचार ,सेवा और त्याग तथा धर्म का मुखौटा लगाकर देश और समाज में प्रभावी हो जाती हैं !तब श्रष्टि का निर्माता ईश्वर स्वयं लोकशिक्छण और लोकव्यबस्था को सुधारने के लिए पृथ्वी पर मानव आकार ग्रहण करता है !और अल्पशक्ति में परिणित लोकशक्ति के साथ खड़ा होकर बहुमत में परिणित आसुरी शक्ति का विनाश करता है !जब लोक व्यबस्था दुर्योधन ऐसे लोगों के हाथ में चली जाती है !जो सभी संसाधनो पर काबिज हो जाते हैं !और अपनी सत्ता और अनीति से उपार्जित सत्ता वैभव और संपत्ति की सुरक्च्छा के लिए सहायकों और समर्थकों का बड़ा समूह एकत्रित कर लेते हैं !मानवता मनुष्यता दानवता के आगे दम तोड़ने लगाती है !प्रकृति भी इन भोगियों के कारण दूषित होजाती है !तब जैसे मकान में पड़ी गर्द और कूड़ा कर्कट को झाड़ू से साफ़ कर मकान को स्वक्छ कर दिया जाता है !ऐसी ही सफाई ईश्वर इन दुष्टों के विनाश से कर सदाचार की स्थापना करता है !
दुर्योधन कहता है !ये सभी लोग मेरे लिए अपने जीवन को बलिदान करने केलिए युद्ध भूमि में एकत्रित हुए हैं !सभी देशों में कालचक्र के कारण ऐसा समय आता है !जब सदाचार परायण सद्गुणी लोग भी इन दुष्ट स्वार्थी और भोगी प्रवृत्तियों के बाहक और पोषण करने वालों के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं !सदाचारी लोग परम्परा और मर्यादा का पालन स्वभाव बस करते हैं !और भोगी स्वार्थी क्रूर और नृशंश पुरुष मर्यादाओं का उपयोग अपने निकृष्ट स्वार्थों की तृप्ति के लिए करते हैं!
1 यही स्थिति उस युग के महान ज्ञानी सद्गुण संपन्न भीष्म और द्रोणाचार्य आदि के समक्छ उत्पन्न हो गयी थे !इन लोगों ने राज्य का नमक खाया था इसीलिए ये राज्य भक्ति से बंध कर दुर्योधन का साथ दे रहे थे !किन्तु ह्रदय से धर्मात्मा पांडवों के साथ थे !जब इस तरह का विचित्र संयोग समाज में निर्मित हो जाता है !सदाचार को कदाचार का माध्यम बना लिया जाता है !तब महाभारत का बीजारोपण प्रारम्भ हो जाता है !जब स्वार्थी लोग सदाचार ,सेवा और त्याग तथा धर्म का मुखौटा लगाकर देश और समाज में प्रभावी हो जाती हैं !तब श्रष्टि का निर्माता ईश्वर स्वयं लोकशिक्छण और लोकव्यबस्था को सुधारने के लिए पृथ्वी पर मानव आकार ग्रहण करता है !और अल्पशक्ति में परिणित लोकशक्ति के साथ खड़ा होकर बहुमत में परिणित आसुरी शक्ति का विनाश करता है !जब लोक व्यबस्था दुर्योधन ऐसे लोगों के हाथ में चली जाती है !जो सभी संसाधनो पर काबिज हो जाते हैं !और अपनी सत्ता और अनीति से उपार्जित सत्ता वैभव और संपत्ति की सुरक्च्छा के लिए सहायकों और समर्थकों का बड़ा समूह एकत्रित कर लेते हैं !मानवता मनुष्यता दानवता के आगे दम तोड़ने लगाती है !प्रकृति भी इन भोगियों के कारण दूषित होजाती है !तब जैसे मकान में पड़ी गर्द और कूड़ा कर्कट को झाड़ू से साफ़ कर मकान को स्वक्छ कर दिया जाता है !ऐसी ही सफाई ईश्वर इन दुष्टों के विनाश से कर सदाचार की स्थापना करता है !
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