पूजा पाठ जब उस पूजा के लिए निर्मित विधि विधान के अनुसार की जाती है ! तब वह उत्तम फल प्रदान करने वाली होती है !भगवान श्री कृष्ण ने गीता के अध्याय १६(२३,२४)में कहा है कि जो मनुष्य पूजा पाठ के लिए नर्मित शाश्त्र विधि को त्यागकर अपनी इक्छा से मनमाना आचरण करते हैं ! वह ना तो अंतःकरण की शुद्धि को प्राप्त होते हैं ! और ना ही उन्हें सुख शांति की और ना परम गति की ही प्राप्ति होती है ! अतः प्रत्येक पूजा पाठ करने वाले स्त्री पुरुषों को पूजा पाठ के लिए निर्मित विधि विधान का पालन करना चाहिए !जिस प्रकार भौतिक वस्तुओं के निर्माण या प्राप्ति के लिए भी उनके लिए निर्मित विधानों और प्रिक्रयाओं का पालन करना पड़ता है !उसी प्रकार से पूजा पाठ के लिए निर्मित विधान का पालन करना भी अनिवार्य है !अगर कोई स्त्री या पुरुष न्यायाधीश का पद प्राप्त करना चाहता है ! तो उसे न्यायाधीश बनने के लिए निर्धारित विधान का पालन करना पड़ेगा !उस पद की प्राप्ति मानव अधिकारों की दुहाई देकर आंदोलन से प्राप्त नहीं की जा सकती है !उसी प्रकार से शनि देव की पूजा भी निर्धारित शास्त्रीय विधान से ही की जानी चाहिए !इसको स्त्री पुरुषों के पूजा पाठ के अधिकारों से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए !शनि देव विघ्न उत्पन्न करने वाले गृह हैं !उनका पूजन विघ्न निवारण के लिए किया जाता है !उनको बुलाने के लिए नहीं किया जाता है !इसिलए शनि मंदिर में प्रवेश करने और उनकी पूजा करने के स्पष्ट निर्देश शाश्त्रों में है !जगद गुरु शंकराचार्य वैदिक सनातन धर्म के संरक्छक और शाश्त्र ज्ञान के प्रामाणिक जानकार होते हैं !इसीलिए इस सम्बन्ध में उनकी राय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए !अगर महिलायें शाश्त्र विधि का त्याग कर शनिदेव की पूजा करना चाहती हैं !और इसको स्त्री के अधिकारों का मुद्दा बना रही हैं !तो उनको संविधान के अनुसार शनि मंदिर में प्रवेश को रोका नहीं जा सकता हैं !किन्तु उन्हें यह समझना चाहिए कि शनि देव के मंदिर में शनि पूजा के लिए निर्मित विधान का उल्लंघन कर पूजा करने से उसका विपरीत विघ्न उत्पन्न करने वाला फल भी प्राप्त हो सकता है !
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