Thursday, 14 January 2016

१(२६,२७)तत्र अपश्यत् स्थितान  पार्थ पितृनथ पितामहान-------जब भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि इस युद्ध भूमि में इकट्ठे हुए कुरुवंशियों को देख  !कुरु शव्द में धृतराष्ट्र और पाण्डु दोनों के पुत्र आ जाते हैं ! क्योंकि ये दोनों ही कुरुवंशी हैं ! तब अर्जुन की दृष्टि दोनों सेनाओं में उपस्थित कुरुवंशियों पर गयी ! उन्होंने देखा सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा आदि पिता के भाई खड़े हैं ! जो कि अर्जुन के लिए पिता के समान थे ! भीष्म सोम दत्त आदि दादा खड़े हैं ! द्रोणाचार्य और कृपाचार्य विद्या देने वाले गुरु खड़े हैं ! पुरुजित ,कुंतिभोज ,शल्य ,शकुनि आदि मामा खड़े हैं ! भीम ,नकुल ,सहदेव ,दुर्योधन ,विकर्ण आदि दुर्योधन के  १०० भाई खड़े हैं! अभिमन्यु ,घटोत्कच ,द्रौपदी के पांचों पुत्र  जो मेरे पुत्र हैं और भतीजे हैं !और दुर्योधन का पुत्र लक्छ्मण तथा दुशाशन के पुत्र भी खड़े हैं ! जो की मेरे भतीजे लगते  हैं ! गुरु पुत्र  अश्वत्थामा आदि जो दुर्योधन के मित्र हैं ! और ऐसे ही मेरे मित्र भी खड़े हैं ! द्रुपद विराट ,शैव्य आदि ससुर और सम्बन्धी भी खड़े हुए हैं ! और युद्ध में बिना किसी स्वार्थ के दोनों पक्छों में अपने प्राणो की आहुति देने के लिए सात्यकि और कृतवर्मा आदि युद्वंशी वीर भी खड़े हुए हैं ! इनके अतिरिक्त बान्हीक आदि प्रिपितामह,,धृष्टद्युम्न शिखंडी ,सुरथ आदि साले, जयद्रथ आदि बहनोई, तथा अन्य बहुत से सगे सम्बन्धी भी दोनों सेनाओं में खड़े हुए हैं ! दोनों ही सेनाओं में सम्बन्धी ही सम्बन्धी देखकर अर्जुन के ह्रदय में कौटंबिक और स्नेहगत आसक्ति के कारण कायरता आगयी ! वह अपने दुष्ट और अधर्म विनाशक कर्तव्य से भ्रष्ट हो गया ! और ऐसी खतरनाक और विषाद ग्रस्त  स्थिति में चलागया जो धर्म और नैतिकता ,आदर और श्रद्धा का चादर ओढ़कर  कर अर्जुन को मोह ग्रस्त  और कर्तव्य भ्रष्ट करने के लिए आई थी ! जिसके कारण अप्रितम और अजेय  योद्धा और दिव्य शक्तियों से संयुक्त अर्जुन विषादग्रस्त हो गया ! उस विषाद के निवारण के लिए भगवान  को उपदेश देना पड़ा जो गीता के रूप में प्रगट होकर  समग्र मानव जाती  के लिए भी मोह मूढ़ता ,और आसक्ति तथा विषाद के निरसन का शशक्त और अमर  माध्यम बन गया      

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