९(१३)देव अर्थात परमात्मा के जितने गुण हैं वे सभी देवी सम्पत्ति कहलाते
हैं ये देवी सम्पत्ति परमात्मा की प्राप्ति कराने वाली होने से देवी
सम्पत्ति कहलाती है महात्मा लोग इसी देवी प्रकृति के आश्रित हो कर भगवान को
संपूर्ण प्राणियोँ का आदि और अविनाशी समझ कर भगवान का भजन करते हैं जो
वास्तविक महात्मा होते हैं उनकी रूचि भोग और सम्पत्ति संग्रह में नहीं होती
है उनकी वृत्ति में मन मष्तिष्क और चित्त में एक परमात्मा के सिवाय और कुछ
नहीं होता है वे छण भर भी परमात्मा का वियोग सहन नहीं कर पाते हैं ऐसे
महात्माओं का आशीर्वाद फल दायी होता है उनके पावन स्पर्श से भमि जल वायु और
समय तक पवित्र हो कर बदल जाता है किंतु आज कल ऐसे महात्मा दुर्लभ हैं
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