१(२० ,२१ ,२२ ) अथ व्यबस्थान दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः -------दोनों सेनाओं की शंख ध्वनि के पश्चात अब युद्ध होने की तैयारी हो ही रही थी !कि उस समय धृतराष्ट्र के पुत्रों ,राजाओं और उनके सहयोगियों को सामने व्यबस्थित रूप में खड़े देख कर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना गांडीव धनुष उठा लिया और अन्तर्यामी भगवान श्री कृष्णा से यह वचन बोले ! हे अच्युत दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को खड़ा कीजिये ताकि में युद्ध में खड़े हुए इन युद्ध की इकच्छावालों को देख लूँ कि इस युद्ध रूप उद्द्योग में मुझे किन किन के साथ युद्ध करना है !अर्जुन के रथ पर जो ध्वजा फहराती थी उसको विश्वकर्मा ने तैयार किया था ! विश्वकर्मा ने यह ध्वजा ट्वस्टा प्रजापति और इन्द्र के साथ मिलकर बनायी थी इन तीनो ने देवमाया के द्वारा इस ध्वजा में छोटी बड़ी अनेक प्रकार की बहुमूल्य एवम दिव्य मूर्तियों का निर्माण किया था ! भीम सेन के अनुरोध से हनुमान जी उस ध्वजा में युद्ध के समय अट्ठहास करते थे ! जिस से शत्रुओं के दिल दहल जाते थे ! और हनुमान जी स्वयं ध्वज पर स्थापित थे ! उस ध्वजा ने ४ कोष अर्थात १२ किलोमीटर तक सम्पूर्ण दिशाओं तथा अगल बगल एवं ऊपर के आकाश को व्याप्त कर रखा था ! विश्वकर्मा ने उस ध्वज के निर्माण में ऐसी देव माया रची थी कि वह ध्वज ब्रकच्छों से आवृत्त अथवा अवरुद्ध होने पर भी कहीं भी अटकती नहीं थी ! जैसेआकाश में बहुरंगा इंद्र धनुष प्रकाशित होता है ! परन्तु यह समझ में नहीं आता है कि वह क्या है ? ठीक ऐसा ही विश्वकर्मा का बनाया हुआ वह ध्वज है ! उसका रूप रंग बिरंगा है ! और वह अनेक प्रकार का दिखाई देता है ! जैसे अग्नि सहित धूम विचित्र तेजोमय आकार और रंग धारण करके सब ओर फैलकर ऊपर आकाश की और बढ़ता जाता है ! उसी प्रकार विश्वकर्मा ने उस ध्वज का निर्माण किया है ! उसके कारण रथ पर कोई भार नहीं बढ़ता है ! और ना उसकी गति में कोई रुकावट ही पैदा होती है !
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