१(३८,३९)यद्द्प्या ये न पश्यन्ति लोभोपहत चेतसा -------यद्द्पि लोभ के कारण जिनका विवेक विचार लुप्त हो गया है ऐसे ये दुर्योधन आदि कुल का नाश करने से होने वाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होने वाले पाप को नहीं देखते हैं ! तो भी हे कृष्ण ! कुल का नाश करने से होने वाले दोष को ठीक ठीक जान ने वाले हम लोग इस पाप से निब्रत्त होने का विचार क्यों ना करें ?पांडवों का स्वभाव पूर्ण रूप से धर्मयुक्त और लोभ मुक्त था ! बे किसी भी स्थिति में कुल का नाश नहीं चाहते थे ! बे दुर्योधन आदि के द्ववारा किये गए अत्यंत अन्याय युक्त क्रूर विध्वंसक आचरण के बाद भी उनसे भाई चारा और सौहाद्र बनाये रखना चाहते थे !इसीलिए युधिस्ठर ने भगवान श्री कृष्ण से कहा था ! जिनका अपने साथ कोई सम्बन्ध भी ना हो तथा जो सर्वथा नीच और शत्रु भाव रखने वाले हों उनका भी वध करना उचित नहीं है ! फिर जो सगे सम्बन्धी श्रेष्ठ और सुहृद हैं ऐसे लोगों का बध कैसे उचित हो सकता है ? हमारे विरोधियों में अधिकांश हमारे भाई बन्धु, सहायक और गुरुजन हैं ! उनका बध करना तो बहुत बड़ा पाप हैं ! युद्ध तो पाप ही है ! इसमें तो कुछ भी अच्छा नहीं है ! जो लोग धीर वीर ,लज्जाशील श्रेष्ठ और दयालु हैं ये ही प्रायः युद्ध में मारे जाते है !और अधम श्रेणी के मनुष्य जीवित बच जाते हैं ! शत्रुओं को मारने पर भी उनके लिए सदा मन में पश्चाताप बना रहता है ! छत्रियों का यह युद्ध रूप कर्म पाप ही है ! हम भी छत्रिय ही हैं !अतः हमारा यह स्वधर्म पाप होने पर भी हमें तो करना ही होगा क्योंकि उसे छोड़ कर दूसरी किसी बृत्ति को अपनाना भी निंदा की बात होगी ! हमलोग ना तो राज्य त्यागना चाहते हैं ! और ना कुल के विनाश की ही इक्छा रखते हैं ! यदि नम्रता दिखाने से दुर्योधन आदि भी शांत हो जाएँ तो वही सबसे उत्तम है ! हम युद्ध की इक्छा ना रख कर साम, दान और भेद सभी उपायों से राज्य की प्राप्ति के लिए पर्यटन कर रहे हैं ! तथापि यदि हमारी साम नीति असफल हुई तो युद्ध ही हमारा प्रधान कर्तव्य होगा ! दुर्योधन आदि का चित्त लोभग्रस्त हो गया है ! यह धृतराष्ट्र ने भी विदुर से कहा था ! दुर्योधन लोभ के अधीन हो गया है ! उसकी बुद्धि दूषित हो गयी है उसके सहायक भी दुष्ट स्वाभाव के ही हैं ! इसीलिए जाओ और परम बुद्धिमती और दूरदर्शिनी गान्धारी देवी को यहां बुला लावो ! मै उसीके साथ इस दुर्बुद्धि को समझा बुझा कर राह पर लाने की चेस्टा करूँगा ! किन्तु दुर्योधन ने अपनी माता गान्धारी की बात को भी नहीं माना था ! वेदव्यास ने भी कहा था स्वजनो के साथ कलह अत्यंत निन्दित माना गया है ! वह अधर्म एवं अपयश बढ़ाने वाला है ! अतः तुम स्वजनो के साथ कलह में ना पड़ो ! कुटुंब अपने शरीर जैसा ही होता है !किन्तु लोभ और एश्वर्या प्राप्त के लिए लालायित दुर्योधन की बुद्धि कुल के नाश और मित्र द्रोह से होने वाले पाप की और ध्यान नहीं दे रहा था !यहाँ अर्जुन की दृष्टि दुर्योधन आदि के लोभ की तरफ तो जा रही है ! पर बे स्वयं स्वजनाशक्ति से आबद्ध होकर बोल रहे हैं ! इस तरफ उनका ध्यान नहीं जा रहा है ! इस कारण बे अपने कर्तव्य से भ्रस्ट हो रहे हैं ! जब तक व्यक्ति की दृष्टि दूसरों के दोषों की तरफ रहती है ! तब तक उसको अपना दोष नहीं दीखता है ! अर्जुन को भी दुर्योधन आदि के दोष दीख रहे हैं ! और अपने में अच्छाई का अभिमान हो रहा है इसीलिए वह अपनी समझ की तारीफ कर रहा है !और अपना मोह रूपी दोष नहीं देख रहा है !और उलटे भगवान श्री कृष्ण को ही उपदेश दे रहा है !
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