गीता ९(१७)जगत का निर्माता परमात्मा है या यह अपने आप बनगया है आदि अनेक
प्रकार के मत जगत निर्माण के सम्बन्ध में प्रचलित है गीता ईश्वर को जगत का
निर्माता मानती है किन्तु ईश्वर प्राणिओं को उनके कर्मानुसार ही शरीर
प्रदान करता है शरीरों की प्राप्ति में परमात्मा हस्तछेप नहीं करता है
जैसे जिसके कर्म होते हैं वैशे ही पशु पक्छी स्त्रीपुरुष आदि के शरीर सभी
प्राणिओं को प्राप्त होते है पूर्वकृत कर्म ही प्राणिओं की शरीर प्राप्ति
का कारण है चूँकि ईश्वर ही जगत का निर्माता है इसलिए वही संपूर्ण
जगत का पिता धाता (धारणकरने वाला )माता पितामह (जगत के निर्माण करने वाले
प्रजापति ब्रह्मा का निर्माता भी ईश्वर है इसलिए ब्रह्मा का जनक होने के
कारण जगत का पितामह भी ईश्वर ही है )गति (कर्मानुसार फलदाता )भर्ता (जगत का
पालन पोषण करने वाला )स्वामी साक्छी (प्राणिओं के कर्मोँ को गबाह की तरह
देखने वाला सभी मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है किन्तु कर्म फल भोग में
परतंत्र है )जीवों की अंतिम गति अर्थात जब मनुष्य कर्म बंधन से मुक्त कर्म
करने की कला का विकास कर लेता है तब वह जीव जो ईश्वर का ही अंश है ईश्वर के
धाम को प्राप्त हो जाता है जो की जीव का निज धाम है आश्रय( बिना किसी भेद
भाव के प्राणिओं की भलाई करने वाला) जगत की उत्पत्ति तथा संघार करनेवाला
तथा सद्गति प्रदान करने वाला और अविनाशी बीज भी ईश्वर ही है समस्त जगत
परमात्म का स्वरुप है यह समझ कर ईश्वर के वास्तविक भक्त संसार की सेवा में
अपने आप को तथा अपने समस्त भौतिक साधनो को निष्काम भाव से सिर्फ ईश्वर
प्राप्ति को ही अपने जीवन का लक्छ्य बना कर लगा देते हैं
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