८(२७)वैदिक धर्म में मनुष्य जन्म को परमात्मा की प्राप्ति का साधन बताया
गया है इसलिए भारत में जन्मे लोग संसार में भोग युक्त आसक्ति न रख इसका
उपयोग मोक्ष प्राप्ति के लिए करते थे इसलिए भारत में आत्मज्ञान प्राप्ति की
जीवन पद्धति का विकास हुआ और पशु पक्षी ब्रिक्छ पर्वत जल आदि में परम
पिता परमात्मा का निवास समझ कर इनका उपयोग भोग दृष्टि से नहीं किया गया
भगवान ने भी सुन्दर अत्यंत उपजाऊ भूमि भारत को प्रदान की तथा धर्म की रक्षा
के लिए अनेकों बार अनेक जन्म लिए भारत ने आत्म विकास करके
अदभुद शक्ति भूत काल में की थी जो भौतिक साधनो से कभी प्राप्त नहीं की जा
सकती थी प्राचीन भारत में दूध घी की नदीयां बहती थी और ज्ञान में जगद्गुरु
और सम्पन्नता में सोने की चिड़िया कहलाता था भारत के धार्मिक मनुष्य अपने
संपूर्ण कर्म अनाशक्ति भाव से परमात्मा को सम्पर्पित करके करते थे कुछ
साधक ऐसे होते थे जो बाह्य तौर पर त्याग युक्त जीवन जीते थे किन्तु उनका
अंतःकरण पूर्ण रूप से भोग मुक्त नहीं होता था इसलिए बे मृत्यु के बाद
स्वर्ग लोक आदि लोकों को प्राप्त कर अपने पुण्यों का भोग भोगते थे और
पुण्य समाप्त होने पर फिर जन्म मरण के चक्र में फंस जाते थे दूसरे प्रकार
के साधक पूर्ण रूप से बीत राग हो कर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं यही दो
गतियां मनुष्योँ को मृत्यु के बात प्राप्त होती है इसलिए कर्म योगी आसक्ति
और राग रहित जीवन जीता हुआ मोक्ष को प्राप्त हो जाता है
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