गीता ज्ञान १(२)दृष्ट्वा तू पाण्डवानीकम व्यूढं दुर्योधनस्तदा ---------दुर्योधन पांडवों की सेना को युद्ध के मैदान में खड़ी देख कर आचार्य द्रोण के पास गया यद्द्पि दुर्योधन की सेना ११ अक्छोहनी थी जो पांडवों की ७ अक्छोहनी सेना से काफी बड़ी थी ! दुर्योधन की सेना पश्चिम दिशा की ओर मुख कर के खड़ी हुई थी जो दैत्य राज की सेना के समान जान पड़ती थी ! पांडवों की सेना पूर्वदिशा की और मुख करके खड़ी हुई थी जो इंद्र की सेना के तुल्य प्रतीत होती थी !
--------------------------------------------आचार्य विनोबा ने इस श्लोक का आध्यात्मिक अर्थ किया है ! उन्होंने लिखा है पांडवों की सेना का वर्णन ३,४,५, में हुआ है ! जबकि कौरव सेना का वर्णन मात्र एक श्लोक में हुआ है ! इसी प्रकार १६ बे अध्याय में देवी संपत्ति का वर्णन तीन श्लोकों में और आसुरी संपत्ति का वर्णन एक श्लोक में हुआ है ! दुर्योधन का आध्यात्मिक अर्थ दुराग्रह है इसका चित्र १६(१०)में है ! युद्ध की अपनी जिद्द ना छोड़ने वाला दुर्योधन दुराग्रही है ! और दुराग्रह की जड़ मे लोभ मोह और क्रोध होता है ! दुर्योधन आसुरीसम्पात्ति का प्रतीक है !और पांडव देवी संपत्ति के प्रतीक हैं !
--------------------------------------------आचार्य विनोबा ने इस श्लोक का आध्यात्मिक अर्थ किया है ! उन्होंने लिखा है पांडवों की सेना का वर्णन ३,४,५, में हुआ है ! जबकि कौरव सेना का वर्णन मात्र एक श्लोक में हुआ है ! इसी प्रकार १६ बे अध्याय में देवी संपत्ति का वर्णन तीन श्लोकों में और आसुरी संपत्ति का वर्णन एक श्लोक में हुआ है ! दुर्योधन का आध्यात्मिक अर्थ दुराग्रह है इसका चित्र १६(१०)में है ! युद्ध की अपनी जिद्द ना छोड़ने वाला दुर्योधन दुराग्रही है ! और दुराग्रह की जड़ मे लोभ मोह और क्रोध होता है ! दुर्योधन आसुरीसम्पात्ति का प्रतीक है !और पांडव देवी संपत्ति के प्रतीक हैं !
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