१(२३,२४ ,25) योत्स्यमानेन अवेक्छे अहम या एते अत्र समागतः -----दुष्ट बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इक्छा वाले जो ये राजा लोग इस सेना में आये हुए हैं ! उन सभी राजाओं को जो युद्ध करने को उतावले हैं ! उन सबको में देख लूँ ! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन के इस प्रकार कहने पर भगवान श्री कृष्ण ने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य भाग में भीष्म और द्रोणा चार्य के सामने खड़ा करके अर्जुन से कहा कि पार्थ युद्ध की इक्छा से इकट्ठे हुए इन कुरुवंशियों को देखो ! विनोबा जी ने बताया है कि अर्जुन के मन की त्रिविध परिणिति दिखाई देती है -----(अ)उत्साह २२,२३ ) (बी)विषाद २८से ४६) (२)७ अर्जुन के चित्त की स्थिति कैसे बदलती गयी इसका चित्रण है ! अर्जुन की बात पूरी होते ही श्री कृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच रथ खड़ा कर दिया ----- श्री कृष्ण के इस तुरत निर्णय लेने का महाभारत का यह वर्णन ध्यान आकर्षित करता है ! कौन सा काम ठीक है और कौन सकाम गलत है ! इस विषय में श्री कृष्ण के मन में कभी संदेह उत्पन्न नहीं होता है ! इसीलिए बे तुरंत कार्य कर लेते थे ! किन्तु जो साधक या जिज्ञासु हैं उन्हें प्रत्येक कार्य भली प्रकार सोच विचार कर ही करना चाहिए !यहाँ अर्जुन ने दुर्योधन को दुर्बुद्धि कहा है !यह कहने के लिए अर्जुन के पास पर्याप्त कारण और प्रमाण थे !दुर्योधन हमेशा पांडवों से वैर और दुर्भाव तथा घृणा का पोषण करता था !वह पांडवों की उन्नति को कभी पचानही पाया था !पांडवों को नष्ट करने का कोई भी अवसर बो हाथ से जाने नहीं देता था ! इसके बाद भी पांडव उसके प्रति हमेशा सद्भाव और भाई चारे का भाव बनाये रहे थे !पांडवों का व्योहार दुर्योधन के प्रति ऐसा ही था जैसा वर्तमान समय में भारत का पाकिस्तान के प्रति सद्भाव और भाई चारे का है !और दुर्योधन का व्योहार पांडवों के प्रति वैसा ही पांडवों को समाप्त करने का था जैसा पाकिस्तान का भारत के प्रति है !महभारत में दुर्योधन आदि के दुर्व्योहार और पांडवों का उनके प्रति सद्व्योहार के अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं !जब पांडवों ने राजसूय यज्ञ किया था ! तो देश विदेश के राजाओं से जो बेश कीमती भेंट पांडवों को प्राप्तहुई थी ! उनको लेने का भार पांडवों ने दुर्योधन को दिया था !पांडवों के उस ऐश्वर्य को देख कर उसके शरीर की कान्ति फीकी पढ़ गयी थी ! वह सफ़ेद और दुर्बल हो गया था ! उसकी दशा बड़ी दयनीय हो गयी थी !और वह सदा चिंता में डूबा रहता था ! यह देख कर उसके पिता धृतराष्ट्र ने दुर्योधन से कहा तुम बहुमूल्य वस्त्र ओढ़ते हो, पहनते हो अच्छी जाति के घोड़े तुम्हारी सवारी में रहते हैं ! बहुमूल्य शैयाएँ, मन को प्रिय लगाने वालीं युवतियाँ , सभी ऋतुओं में रहने के लिए विशाल भवन ,देवताओं के भांति सभी ऐश्वर्य तुम्हे कहने मात्र से प्राप्त हो जाते हैं ! तुमने कृपाचार्य से निरुक्त ,निगम ,छंद ,वेद के छहों अंग ,अर्थ शाश्त्र तथा आठ प्रकार के व्याकरण शाश्त्रों का अध्यन किया है ! बलराम ,कृपा चार्य तथा द्रोणाचार्य से तुमने अश्त्र विद्या सीखी है ! सूत और मागध सदा तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं ! तुम्हारी बुद्धि की प्रखरता प्रसिद्ध है ! तुम्हें क्यों चिंता हो रही है ? तम्हारे इस शोक का कारण क्या है ? यह हमें बताओ ! दुर्योधन ने कहा युधिस्ठर की उन्नति देख कर मेरे शरीर की कान्ति फीकी पड़ गयी है ! तथा मै दीन दुर्वल हो गया हूँ ! व्यक्ति के सर्वनाश में ईर्ष्या से घातक और कोई अन्य तत्त्व नहीं है !दुर्योधन की पांडवों के प्रिति इसी ईर्ष्या ने भयानक युद्ध को जन्म दिया !जिस से सर्वनाश हुआ !ईर्ष्या मनुष्य के ज्ञान विज्ञान बुद्धि और विवेक का नाश कर देती है !
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