Tuesday, 26 January 2016

१)(४४,४५) उत्सन्न कुल धर्माणाम् मनुष्याणां जनार्दन नरके अनियतमवासो भबतीतिअनुशुश्रम========हे कृष्णा जिनके कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं ! उन मनुष्यों का बहुत काल तक नरक बॉस होता है  !ऐसा हम सुनते आये हैं ! यह बड़े आश्चर्य और खेद की बात है कि हम लोग राज्य सुख लोभ से कुल का नाश करने का बड़ा भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे ! और राज्य की प्राप्ति के लिए अपने स्वजनो को ही मारने के लिए तैयार हो गए !मोह मूढ़ता और आसक्ति तथा नीति अनीति और कर्त्तव्य पालन तथा कर्तव्य भ्रष्टता  के लिए भी सभी लोग आधार धर्म में ही खोजते हैं !यहाँ अर्जुन भी कर्त्तव्य त्याग के लिए धर्म को ही माध्यम बना रहा है !और कुल के नाश को आधार बनाकर राज्य धर्म पालन के बड़े उत्तरदायित्त्वा के निर्बहन से  पलायन कर रहा है !विनोबाजी ने इस श्लोक की व्याख्या करते हुए अर्जुन के इस कथन में तीन विचार दोष बताये हैं -----(१)मै मारने वाला -----आत्मविषयक अज्ञान (२)स्वजन मोह -----स्वधर्मनिष्ठा की कमी ! स्वधर्म अर्थात कर्त्तव्य पालन में स्वजन परिजन  आसक्ति या मोह  नहीं रहना चाहिए (३)सुख के लिए राज्य की प्राप्ति -----कर्मयोग के विषय में गलत कल्पना युद्ध राज्य सुख के लिए नहीं है  ! राज्य भी सुख के लिए नहीं है ! वह कर्त्तव्य पालन और प्रजा की रक्छा सुरक्च्छा और समृद्धि तथा लोक हित साधन के लिए है !
----------पांडव सदा कुल की रक्छा के लिए प्रयत्नशील रहे !शक्तिशाली होते हुए भी उन्होंने कुल  का नाश ना हो इसके लिए अपने राज्य प्राप्ति के अधिकार को त्याग कर मात्र जीविको  पार्जन के लिए पांच गाओं की मांग की थी ! जिसके उत्तर में दुर्योधन का कथन था कि वह बिना युद्ध के सुई की नौक बराबर भी भूमि नहीं देगा ! !पांडव जब १२ बरष का बनवासी जीवन अत्यंत कष्ट में कन्द मूलफल खाकर और जमीन पर सोकर बिता रहे थे !उस समय भी करण  दुर्योधन और शकुनि दुःशाशन ने मंत्रणा कर पांडवों को मारने का षड्यंत्र किया था ! दुर्योधन अपने साथ बनवासी पांडवों को मारने केलिए अाठ हजार रथ तीस हजार हाथी कई हजार पैदल और नो हजार घोड़े लेकर गया था ! किन्तु दुर्योधन आदि का द्वैतबन में जहाँ पांडव रह रहे थे ! गन्धर्वों से युद्ध हो गया गन्धर्वों ने युद्ध में करण को पराजित कर दिया था ! और करण अपनी जान बचाकर युद्ध से भाग गया था ! दुर्योधन की सारी सेना भी भाग गयी थी  धृतराष्ट्र के सभी पुत्र भी भागने लगे  थे ! किन्तु दुर्योधन और दुशाशन आदि को गन्धर्वों ने  पकड़ कर कैद कर लिया था  दुर्योधन आदि की रानियों को भी कैद कर लिया ! गन्धर्व जब दुर्योधन आदि को बंदी बनाकर ले जाने लगे ! तब सभीे कौरव सैनिक पांडवों की शरण में गए ! और उनसे कहा कि हमारे राजा दुर्योधन आदि को गन्धर्व बंदी बनाकर ले जा रहे हैं ! आप उनकी रक्छा  कीजिये ! भीमसेन ने सैनिकों की दीन पुकार सुन कर कहा था कि हम लोगों को जो काम करना चाहिए था वह गन्धर्वों ने पूरा कर दिया है ! ये कौरव कुछ और ही करना चाहते थे ! इन्हे विपरीत परिणाम देखना पड़ा है ! कपट विशेषज्ञ दुर्योधन आदि का यह हमलोगों को नुकसान पहुंचाने वाला षड्यंत्र गन्धर्वों ने विफल कर दिया है 1 भीम को इस प्रकार बात करते देख युधिस्ठर ने कहा ----भइया यह कड़वीं बातें कहने का समय नहीं है  !इस समय कौरव भारी संकट में फंस गए हैं ! हमको इस समय इनकी मदद करनी चाहिए ! भाई बंधुओं में मतभेद और लड़ाई झगडे होते ही रहते हैं ! कभी कभी उनमे वैर भी बन्ध जाता है ! परन्तु इस से कुल धर्म नष्ट नहीं होता है ! अर्थात कुल की रक्छा करने का कर्तव्य फिर भी बना रहता है ! जब कोई बाहर का मनुष्य कुल पर आक्रमण करता है तब श्रेष्ठ पुरुष उस बाहरी मनुष्य केद्वारा  होने वाले तिरिष्कार को सहन नहीं करते हैं ! दूसरों के द्वारा  आक्रमण किये जाने पर हम १०५ भाई हैं ! अर्जुन , ,नकुल ,सहदेव और तुम किसी से भी पराजित नहीं किये जा सकते हो ! गन्धर्वों द्वारा बंदी बनाये गए  दुर्योधन आदि को छुड़ा लाओ  !इसी समय चित्र सेन गन्धर्व द्वारा बंदी बनाया गया दुर्योधन जोर जोर से रोने लगा और बोला पुरूबंश का यश बढ़ाने वाले समस्त धर्मात्मात्माओं में श्रेष्ठ पुरुष सिंह महाबाहु पाण्डुपुत्र युधिस्ठर मेरी रक्छा करो ! यह शत्रु तुम्हारे भाईओं को बंदी बनाकर लिये जा रहे हैं ! हमारे प्राणों की रक्छा करो ! कुरुवंश के लिए बड़ा भारी अपयश प्राप्तहो रहा है ! तब पांडवों ने गन्धर्वों से युद्ध कर उनको पराजित किया ! औरदुर्योधन आदि को उनकी कैद से मुक्त कराकर उनको जीवन दान प्रदान किया था ! उनके छूटने के बाद युधिस्ठर नेदुर्योधन आदि से कहा था कि फिर कभी ऐसा  दुस्साहस ना करना ! हमलोगों के प्रति मन में शत्रुता न रखना !किन्तु दुर्योधन की दुष्ट बुद्धि ने और उसकी कपट मंडली कर्ण दुशाशन शकुनि आदि ने पांडवों के द्वारा  की  गयी कुलरक्छा का उत्तर कुल के बिनाश से दिया था ! स्वजनाशक्ति  ,मोह और मूढता के कारण ही आज भी राष्ट्र मे लोकतांत्रिक भाव का सृजन नहीं हो पारहाहै !          

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