१(४०,४१)कुल्छ्ये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनः ---------------कुल का नाश होने पर सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म का नाश होने पर शेष बचे हुए सम्पूर्ण कुल को अधर्म दबा लेता है ! हे कृष्ण अधर्म के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां सदाचरण को त्यागकर भ्रष्ट हो जाती हैं ! और स्त्रियों के चरित्र भ्रष्ट हो जाने से वर्ण शंकर संताने उत्पन्न होने लगती हैं !कुल का नाश ना हो और युद्ध भी न हो इसका गंभीर प्रयत्न श्रीकृष्ण और पांडवों तथा ऋषियों आदि ने भी किया था !किन्तु दुर्योधन ,करण ,दुशाशन ,और शकुनि आदि के हठ और दुराग्रह तथा धृतराष्ट्र की दुर्योधन के प्रति आसक्ति के कारण युद्ध टाला नहीं जा सका था ! विदुर जो धृतराष्ट्र के भाई थे !उन्होंने भी धृतराष्ट्र को धर्म युक्त उपदेश देकर कहा था ! कि पांडवों के साथ युद्ध करने में जो दोष है ! उन पर दृष्टि डालिये ! एक बार युद्ध छिड़ जाने पर सभी का नाश हो जाएगा ! इसके सिबा पुत्रोंके साथ वैर और नित्य आक्रोश पूर्ण जीवन कीर्ति का नाश और आपके शत्रुओं को आनंद की प्राप्ति इस पारिवारिक विनाश से होगी ! भीष्म द्रोण तथा पांडवों का बढ़ा हुआ क्रोध अत्यंत विनाशकारी सिद्ध होगा ! आपके १०० पुत्र करण और पांच पांडव ये सब मिलकर समुद्र पर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी का शाशन कर सकते हैं ! आपके पुत्र जंगल के समान है ! और पांडव उसमे रहने वाले सिंह हैं !आप सिंघो सहित सभी जंगल को नष्ट ना कीजिए ! तथा जंगल से उन सिंघों को दूर ना भगाइए ! आपके कुल में उत्पन्न ये अग्नि के समान तेजस्वी पांडव छमाभाव से युक्त और दुर्गणों से शून्य है ! अपने पुत्रों सहित आप लता के समान है !और पांडव महान ब्रक्छ के सद्दृश हैं ! ब्रक्छ का आश्रय लिए बिना लता कभी भी विकसित नहीं हो सकती है ! जो अपने कुटुम्बीजनों का सत्कार करता है ! वह सुख और समृद्धि की प्राप्ति करता है ! आप समर्थ हैं ! वीर पांडवों पर कृपा कीजिये ! और उनकी जीविका के लिए उन्हें कुछ गाओं दे दीजिये ऐसा करने से आपको संसार में यश की प्राप्ति होगी ! आपको अपने पुत्रों को नियंट्रण में रखना चाहिए ! धृतराष्ट्र ने कहा विदुर तुम जो कुछ कह रहे हो वह परिणाम में हितकर है और यह ठीक भी है ! जिस ओर धर्म होता है विजय उसीकी होती है ! किन्तु में दुर्योधन का त्याग नहीं कर सकता हूँ ! यद्द्पि पांडवों के प्रति मेरी बुद्धि सदा प्रेम पूर्ण रहती है ! किन्तु दुर्योधन से मिलाने पर मेरी बुद्धि पलट जाती है ! प्रारब्ध को उल्लघन करने की शक्ति किसी में नहीं है ! मै तो प्रारब्ध को ही अचल मानता हूँ ! उसके सामने पुरुषहार्थ व्यर्थ है ! भीम नेभी भगवान श्री कृष्ण से कहा था कि आप कौरवों के बीच में ऐसी ही बातें कहें जिस से हमलोगों में शांति स्थापित हो सके ! युद्ध की बात उन्हें सुनाकर आप भय भीत ना करना ! दुर्योधन असहनशील, क्रोध में भरा रहने वाला, श्रेय ओर सद्भाव का विरोधी और दिल में बड़े हौसले रखने वालाहै ! अतः उसके प्रति कठोर बात न कहियेगा उसे सामनीति के द्वारा ही समझाने का प्रयत्न कीजियेगा ! हम सभी पांडव नीचे पैदल चलकर अत्यंत नम्र होकर दुर्योधन का अनुसरण करते रहेंगे !परन्तु हमारे कारण भारतवंशियों का नाश ना हो ! आप भीष्म पितामह ,आदि से शांति स्थापित करने के लिए ही कहें जिस से सब भाईयों में सद्भाव बना रहे और दुर्योधन भी शांत हो जाय ! राजा युधिस्ठर भी शांति चाहते हैं ! और अर्जुन भी युद्ध के इक्छुक नहीं हैं क्योंकि अर्जुन में बहुत अधिक दया भरी हुई है !शव्द ग्यानी धृतराष्ट्र भी दुर्योधन में आसक्ति के कारण धर्म का पालन नहीं कर रहा है !और अर्जुन भी स्वजनाशक्ति के कारण कर्त्तव्य से भ्रष्टहोकर धर्म की बात कर रहा है और अधर्म तथा कर्तव्य त्याग से समाज में कर्म संकरता का सर्जन करना चाहता है !आसक्ति के निरसन के बिना धर्म चर्चा वन्ध्या पुत्र के समान है !धर्म की सिद्धि और उपलब्धि कर्तव्य पालन से ही होती है !
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