१(४२,४३)संकरो नरकायेबकुलघ्नानाम कुलस्य च ----------------वर्णसंकर कुलघातियों और कुल को नरक में ले जाने वाला ही होता है ! श्राद्ध और तर्पण ना मिलने से कुलघातियों के पितर भी पितृलोक से गिर जाते हैं ! इन वर्णसंकर संतानो के उत्पन्न होने से कुलघातियों के सदा से चलते आये कुलधर्म और जाति धर्म भी नष्ट हो जाते हैं !महाभारत ने युधिस्ठर के प्रश्न के उत्तर में भीष्म पितामह ने बताया कि पूर्वकाल में प्रजापति ने यज्ञ के लिए केवल चार वर्ण और उनके पृथक पृथक कर्मों की ही रचना की थी ! किन्तु धन पाकर या धन के लोभ से अथवा वासनाओं के बशीभूत होकर विभिन्न वर्णो के स्त्री पुरुषों में विवाह और विवाहोत्तर अथवा बिना विवाह के भी सम्बन्ध स्थापित हो गए ! जिस से वर्ण व्यबस्था का उल्लंघन और अतिक्रमण होने लगा ! परिणाम स्वरुप वर्ण संकर संतानों का जन्म होने लगा ! वर्तमान समय में सभी वर्णो के स्त्रीपुरुषों वर्णधर्म का त्यागकर वैवाहिक और व्याहरहित यौन सम्बन्ध स्थापित करते देखे जाते हैं ! जो वर्ण संकर संताने उत्पन्न होती हैं ! उनके कर्मों से ही उनके वर्ण की पहचान होती है ! क्योँकि वर्णाश्रम व्यबस्था गुण और कर्मों पर ही आधारित थी ! वर्णसंकर पुरुष अपने पिता या माता के अथवा दोनों के ही स्वभाव का अनुसरण करता है ! वह किसी भी प्रकार से अपने प्राकृतिक स्वाभाव को छिपा नहीं सकता है ! जैसे शेर अपनी चित्र विचित्र खाल और रूप के द्वारा माता पिता के समान ही होता है !उसीप्रकार मनुष्य भी अपनी योनि का ही अनुसरण करता है ! यद्द्पि कुल और वीर्य गुप्त रहते हैं !अर्थात कौन कुल में और किसके वीर्य से उत्पन्न हुआ है ! यह बात ऊपर से प्रगट नहीं होती है ! तो भी उसकाजन्म संकर योनि में हुआ है ! वह मनुष्य थोड़ा बहुत अपने माता पिता के स्वभाव का प्रदर्शन करता ही है ! सन्सार के सभी प्राणी नाना प्रकार के आचार व्योहार में लगे हुए हैं ! और भांति भांति के कर्म करते हैं ! अतः आचरण के सिवा ऐसी कोई वास्तु नहीं है जो जन्म के रहस्य को साफ़ तौर पर प्रगट कर सके ! ब्राह्मण वर्ण का मनुष्य भी यदि उत्तम शील अर्थात आचरण हीन हो तो उसका सत्कार ना करे ! और शूद्र भी यदि धर्मज्ञ और सदाचारी हो तो उसका विशेष आदर करना चाहिए ! मनुष्य अपने शुभाशुभ कर्म, शील ,आचरण और कुल के द्वारा अपना परिचय देता है ! यदि उसका कुल नष्ट हो गया हो तो भी वह अपने कर्मों द्वारा उसे फिर शीघ्र ही प्रकाश में ला देता है ! वर्तमान समय में जिस बच्चे के माता पिता का पता ना चले उसका वर्ण उसके पालक पिता का ही मानना चाहिए !और पालक पिता के सगोत्र बंधुओं का जैसा संस्कार होता है वैसा ही उसका भी करना चाहिए तथा उसी वर्ण की कन्या के साथ उसका विवाह भी कर देना चाहिए !
विनोबा जी ने कुलधर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि सब धर्मों से कुलधर्म बलवान है ! कुल से विशिष्ट संस्कार प्राप्त होते हैं !विशिष्ट गुणों का विकास होता है ! मनुष्य के चित्त पर उनका बहुत प्रभाव रहता है ! उसी में से उसका स्वधर्म निश्चित होता है ! इसीलिए कुलधर्म श्रेष्ठ है धर्म का उदय पहले चित्त में होता है ! फिर उस से भावना पैदा होती है !जब वह प्रत्यक्छ कृति में आता है तब वह कर्तव्य होता है ! मानव मूल्यों और संस्कारों की रक्छा स्त्रियों से ही होती है ! बच्चों के प्रथम संस्कार माता से ही निर्मित होते हैं ! शास्त्रकारों ने स्त्री को उच्च स्थान दिया है 1 इसीलिए स्त्री के लिए अनेक प्रकार के बंधन माने गए हैं ! स्त्री को पुरुष की अपेक्छा अधिक श्रेष्ठ अधिक योग्य माना गया है ! इस बात को ध्यान में रख कर स्त्री पुरुष समानता के बारे में सोचना चाहिए ! स्त्री पुरुष समानता का यह अर्थ नहीं है कि पुरुष जिस प्रकार का दुराचार आदि कर अपना पतन करते हैं ! वैसा ही स्त्रियों को भी करना चाहिए !
विनोबा जी ने कुलधर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि सब धर्मों से कुलधर्म बलवान है ! कुल से विशिष्ट संस्कार प्राप्त होते हैं !विशिष्ट गुणों का विकास होता है ! मनुष्य के चित्त पर उनका बहुत प्रभाव रहता है ! उसी में से उसका स्वधर्म निश्चित होता है ! इसीलिए कुलधर्म श्रेष्ठ है धर्म का उदय पहले चित्त में होता है ! फिर उस से भावना पैदा होती है !जब वह प्रत्यक्छ कृति में आता है तब वह कर्तव्य होता है ! मानव मूल्यों और संस्कारों की रक्छा स्त्रियों से ही होती है ! बच्चों के प्रथम संस्कार माता से ही निर्मित होते हैं ! शास्त्रकारों ने स्त्री को उच्च स्थान दिया है 1 इसीलिए स्त्री के लिए अनेक प्रकार के बंधन माने गए हैं ! स्त्री को पुरुष की अपेक्छा अधिक श्रेष्ठ अधिक योग्य माना गया है ! इस बात को ध्यान में रख कर स्त्री पुरुष समानता के बारे में सोचना चाहिए ! स्त्री पुरुष समानता का यह अर्थ नहीं है कि पुरुष जिस प्रकार का दुराचार आदि कर अपना पतन करते हैं ! वैसा ही स्त्रियों को भी करना चाहिए !
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