८(२८)गीता में अनाशक्ति युक्त फल कामना रहित निष्काम कर्म करने पर बहुत जोर
दिया गया है कर्त्तव्य कर्म यदि कर्त्तव्य रूप में फल की कामना के बिना
किया जय तो उस से आत्म शांति की प्राप्ति तो होती ही कर्म करने में दक्छता
और कुशलता की भी प्राप्ति होती है तथा सबसे बड़ी उपलब्धि यह होती है कि
समाज में सद्गुण विकास होता है तथा कपट पाखंड और अपने आप को अनुचित तरीके
से महत्ता प्राप्त कराने की चेष्टा का नाश हो जाता है वेदों का अध्यन ,
यज्ञ तप दान आदि करने वालों को भौतिक समृद्धि प्राप्त होती
है इसलिए समाज में परमात्मा प्राप्ति के स्थान पर भौतिक शक्ति समृद्धि मान
इत्यादि की प्राप्ति के लिए यज्ञ आदि करने वालों की संख्या बढ़ने लगाती है
और ऐसे लोगों की सारी शक्ति अनुचित तरीके से अपनी और अपने परिवार के विकास
में लग जाती है जिस से न तो तप दान यज्ञ आदि करने वालों को आध्यात्मिक
शांति प्राप्त होती है और नाही समाज में सद्गुण विकास होता है समाज में
दम्भी कपटी पाखण्डिओं का बाहुल्य हो जाता है और धार्मिक सामाजिक राजनैतिक
आदि सारी क्रियायोँ में शब्दों में ही धर्म रह जाता है आचरण में पाखंड ही
पाखंड के दर्शन होते हैं किन्तु कर्म योगी के कर्त्तव्य कर्म खुद के विकास
के लिए नहीं होते है इसलिए वह वेदाध्यन करने वाले तथा सकाम तपस्या दान यज्ञ
आदि करने वालों की अपेक्छा श्रेष्ठ फल प्राप्त करता है यानि उसको
आत्मशांति की प्राप्ति होती है और समाज में सद्गुण विकास होता है
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