Saturday, 23 January 2016

जीवन योग गीता २(२२बासान्सि जीर्णानि- आत्मा अजर अविनाशी है और उसको उसके कर्मानुसार शरीर प्राप्त होते रहते है सभी प्राणिओं के शरीर नाशवान है और आत्मा जो शरीरोँ के अंदर निवास करने से जीवात्मा कहलाता है अविनाशी है ऐसा विनाशी शरीर और अविनाशी जीवात्मा का संगम यह मनुष्य शरीर है यह समझ कर शरीर की मृत्यु को अनिवार्य तथ्य के रूप में ग्रहण करना चाहिए जिस प्रकार मनुष्य पुराने कपड़ों को त्याग कर नए वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार सभी शरीरोँ में रहने वाला जीवात्मा पुराने शरीरोँ को छोड़ कर नए शरीर धारण कर लेता है पुराने शरीरोँ को छोड़ कर नए शरीरोँ को धारण करने की इस प्रिकिरिया को ही मृत्यु का मुख कहा जाता है जीवात्मा को उसके कर्मानुसार नए शरीरोँ की प्राप्ति होती रहतीहै जीवात्मा को कर्मानुसार ८४ लाख योनिओं में भटकना पड़ता है जब तक उसे अपने निज भगवद धाम या मुक्ति प्राप्त नहीं हो जाती है शरीर कर्मानुसार बदलते रहते हैं किन्तु जीवात्मा वही रहता है अमावस्या के अन्धकार के बाद जब चन्द्रमा पुनः प्रकट होता है तो यही कहा जाता है की यह वही चन्द्रमा है इसी प्रकार दूसरे शरीर में प्रिवेश करने के बाद भी देहधारी आत्मा वही है यह समझना चाहिए जैसे चन्द्र ग्रहण में अंधकार रूप राहु चन्द्रमा की और आता और जाता दिखाई नहीं देता है उसी प्रकार जीवात्मा भी शरीर में आता और शरीर को छोड़ कर जाता हुआ दिखाई नहीं पड़ता है इस श्लोक में शरीराणि पद बहुवचन में देने का तात्पर्य है की जबतक जीवात्मा को अपने वास्तविक स्वरुप का बोध नहीं होता तब तक यह जीव ८४ लाख योनिओं में भ्रमण करता रहता है और प्रकार प्रकार के शरीर धारण करता ही है देही पद का प्रयोग सम्पूर्ण जीवों का ज्ञान कराने केलिए हुआ है यहाँ प्रश्न खड़ा होता है की पुराने कपडोँ का दृष्टान्त शरीरोँ पर कैसे लागू हो सकता है क्योँकि शरीर तो बच्चोँ और जवानोँ के भी मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं सभी सरीरोँ की मृत्यु आयु समाप्त होने पर ही होती है इसलिए मृत्यु का समय होना ही शरीरोँ का जीर्ण होना है वैसे भी शरीर प्रीति छण और प्रितिदिन अवस्था परिवर्तन से जीर्ण होता रहता है युवा बस्था होने से बचपन मर जाता है और बृद्ध होने से युवाबस्था मर जाती है प्रत्येक मनुष्य में एक इक्छा शक्ति होती है और एकप्राण शक्ति होती है इक्छा शक्ति के रहते हुए प्राणशक्ति नष्ट हो जाती है तब नया जन्म होता है अगर इक्छा शक्ति ना रहे तो प्राणशक्ति नष्ट होने पर भी पुनर जन्म नहीं होता है

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