१(३४, ३५)आचार्याः पितरः ,पुत्रास्तथैव चः पितामह========आचार्य ,पिता ,पुत्र ,और पितामह ,मामा स्वसुर ,पौत्र ,साले ,तथा अन्य जितने भी सम्बन्धी हैं ! यदि बे मुझ पर प्रहार भी करें तो भी में इनको मारना नहीं चाहता हूँ ! और हे कृष्ण यदि मुझे पृथ्वी ,पाताल और अन्तरिक्छ का राज्य भी मिलता हो तो भी में इनको मारना नहीं चाहता हूँ ! फिर इस पृथ्वी के राज्य के लिए तो में इनको कैसे मार सकता हूँ ? अर्जुन के इस कथन से उसका कुटुम्ब प्रेम और युद्ध ना करने की बृत्ति का अहसास होता है ! बहुत से लोगों को अर्जुन के इन कथनो से यह कहने का अवसर प्राप्त होता है कि अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता था भगवान श्री कृष्ण ने उसको युद्ध में लड़ने के लिए प्रेरित किया और महाविनाश करवा दिया ! बहुत से गीता के भाष्यकार यह भी कहते हैं कि वास्तव में महाभारत का युद्ध कभी हुआ ही नहीं है !उपनिषदों में वर्णन है कि शरीर में एक सनातन देवा सुर संग्राम चलता रहता है तदनुसार गीता के १६ बे अध्याय में दैवी और आसुरी सम्पत्तियों का उल्लेख किया गया है ! विनोबाजी ने कौरव का अर्थ कर्मासक्त और मूढ राजस तामस बृत्ति किया है ! कुरु का सूक्छम अर्थ है कर्मासक्त जिनके पीछे कुरु कुरु लगा है ! बे मूढ़ और तामस कौरव ! पांडव अर्थात प्रज्ञावान ,ज्ञान दृष्टि ,सात्त्विक बृत्ति से संपन्न आसुरी विरुद्ध दैवी अथवा राजस तामस विरुद्ध सत्त्वविक बृत्ति ! इस प्रकार गीता में इस इस युद्ध का दुहरा स्वरुप है ! कौरव पांडव रूपक है यह बात गांधी जी भी मानते थे !उनके पहले भी कई भाष्यकारों ने कहा है कि मनुष्य के ह्रदय में कुरुछेत्र है ! गीता में दैवी और आसुरी शक्तियों का निरूपण किया गया है !जो प्रत्येक मनुष्य के अंदर रहती हैं !गीता पर जितने भी भाष्य और टीकाएँ है !वे भाष्यकारों की बुद्धि और ज्ञान के अनुसार ठीक हैं !लेकिन गीता का मर्म और धर्म तथा तत्त्व बिना महाभारत के अध्ययन चिंतन और मनन के बगैर स्पष्ट नहीं हो सकता है !व्यास देव ने एक लाख श्लोकों में महाभारत कि मानसिक रचना तीन साल में हिमालय की तलहटी में बैठ कर की थी जिसको गणेशजी ने लेखनी से लिपिबद्ध किया था !महभारत में ८८०० श्लोक ऐसे हैं जिनका अर्थ सिर्फ व्यासजी जानते हैं या सुखदेव जानते हैं !गीता भी महाभारत का ही हिस्सा है !जो गीता में सूत्र रूप में हैं !उसका विस्तृत स्वरुप महाभारत में हैं !इसीलिए अर्जुन के कथन को उसके महाभारत में बर्णित भिन्न भिन्न समय में दिये गए कथनो और उसके समग्र जीवन के आधार पर ही समझाना होगा !गीता युद्ध कराने या युद्ध कला को सिखाने वाला धर्म ग्रन्थ नहीं है !गीता व्यक्ति को हर परिस्थिति में कर्तव्य का निष्काम भाव से पालन करने की शिक्छा देने वाला अमूल्य ग्रन्थ है ! युद्ध ऐसी भयानक स्थिति में भी अपने कर्तव्य कर्म का अनासक्त भाव से निर्बहन कर व्यक्ति मोक्छ प्राप्तकर सकता हैं !मोक्छ और परमगति ,परमशान्ति ,आदि सभी प्रकार कि श्रेष्ठ गतियों की उपलब्धि मनुष्यों को अनासक्त भाव से कर्तव्य पालन से हो सकती है !यही गीता का सनातन सर्वकालिक सन्देश मनुष्य मात्र के लिए है !!गीता में धर्म का अर्थ भी कर्तव्य कर्म ही है !जब यह कर्तव्य कर्म निष्ठापूर्वक अनासक्त भाव से किया जाता है !तब यह कर्तव्य कर्म आत्मशांति प्राप्ति का मार्ग और परमपद प्राप्ति का साधन बन जाता है !वर्तमान काल में मनुष्य जीवन के सभी कर्म छेत्र भोग कामनाओं से पूर्णरूप से आच्छादित होकर दूषित प्रदूषित हो गए हैं और लगातार हो रहे हैं ! सभी लोग वासनाओं और इक्छाओं की तृप्ति में प्रयासरत देखे जाते हैं !बे वासनाओं के माया जाल में इतने उलझे हुए हैं कि बे अपने आत्मस्वरूप को विस्मृत कर कामनापूर्ति में लगे रहकर देश और समाज का ताना बाना नष्ट कर रहे हैं !माया ममता से प्रेरित महत्त्वकांछियों के समुदाय ने सामान्य मनुष्यों का जीवन अनेक प्रकार के कष्टों से परिपूर्ण कर दिया है !कोई भी संगठन या संस्थान लोकहित के कार्यों को कर्तव्य निष्ठा से संचालित करता नहीं दिखाई देता है !लोग कामना भोग के सेवन में इतने मसगूल दिखाई देते हैं !कि उनको अच्छे बुरे का भेद ही नष्ट हो गया है !आसक्ति और कामनाओं के भोग के कारण बे त्याग प्रेम करुणा अपरिग्रह भक्ति आदि की अच्छी बातें बिभिन्न मंचों से करते दिखाई देते हैं !किन्तु आचरण पूरी तरह कामना और भोग प्रधान है !और बे पूरी तरह से परिवार कल्याण और अपने शरीरों को प्रितिस्ठा प्रदान कराने के प्रयत्नो में मशगूल दिखाई देते हैं !अर्जुन भी यहाँ स्वजनासक्ति से आसक्त होकर अपने पूर्वकथनो से पलट कर त्याग की बात कर रहा है !जब उसके प्रिय हितों पर आक्रमण होगा तो वह फिर जिन लोगों को ना मरने की बात यहाँ कह रहा है !उनको युद्ध में मारने के लिए कृत संकल्प हो जाएगा !यहाँ वह यह आसक्तिके कारण भूल गया है !कि इस कथा के पहले उसने इनही आचार्य और पितामह के लिए क्या उदगार व्यक्त किये थे !और बाद में भी फिर उसने इन सबके साथ युद्ध किया था ! अर्थात अपने कर्तव्य कर्म का निष्पादन किया था !
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