Monday, 18 January 2016

१(३२,३३)  ना कांक्छे विजयम कृष्ण ना च राज्यम सुखानि च ----------हे कृष्ण ना तो में विजय चाहता हूँ ना राज्य चाहता हूँ तथा ना सुखों  को ही  चाहता हूँ  हे गोविन्द हम लोगों को राज्य से क्या लाभ है ? और  भोगों से भी क्या लेन्हा   है ? जिनके  लिए हमारी राज्य भोग और सुख  की इक्छा है बे ही सभी अपने प्राणो की और धन की आशा का त्याग करक युद्ध भूमि में  खड़े हैं ! भौतिक जगत में आसक्ति अनेक प्रकार से व्यक्तियों को पकड़ती है !और कर्तव्य भ्रष्ट  करती है !यहाँ अर्जुन को कर्तव्य भ्रष्ट करने के लिए सभी प्रकार के अधिकारों और राज्य सुख  भोग के प्रति उदासीनता के रूप में आई है !अर्जुन का धर्म युद्ध रूप कर्तव्य कर्म करने का था !राज्य की प्राप्ति तो युधिस्ठर को होना थी !और राज्य से प्राप्त होने वाले सुख भी  सभी  को प्राप्त होने थे ! युद्ध  को भी पांडवों ने टालने का भरसक प्रयत्न किया था !यह युद्ध दुर्योधन के अन्याय और हठ धर्मिता  के कारण हो रहा था  ! !जब व्यक्ति का चित्त आसक्ति के प्रभाव में आ जाता है !तो उसकी बुद्धि में मूढता  छा जा जाती है  !और विवेक बुद्धि नष्ट हो जाती है !राज्य प्राप्ति और राज्य सुख भोगने की बलवती आकांछा ने दुर्योधन की बुद्धि विवेक का अपहरण कर लिया था !इसीलिए उसने किसी की भी सलाह को नहीं माना था !यहाँ तक कि वह पांडवों को उतनी भूमि भी बिना युद्ध के देने को तैयार नहीं था !जितनी भूमि सुई की नौक पर आ सकती थी !किन्तु जब उसकी संपूर्ण सेना और कुल का नाश हो गया !तब वह भी ऐसी ही भाषा बोल रहा था जैसी भाषा अर्जुन यहाँ बोल रहे हैं !उसने युधिस्ठर से कहा था में जिनके लिए कौरवों का राज्य चाहता था बे मेरे सभी भाई मारे जा चुके हैं ! भूमंडिल के सभी छत्रिशिरोमणियों का संघार हो गया है !यहां  के सभी रत्न नष्ट हो गए हैं  !अतः विधवा स्त्री के समान श्रीहीन हुई इस पृथ्वी का उपभोग करने के लिए अब मेरे मन में तनिक भी उत्साह नहीं है ! जब द्रोण और करण शांत हो ग़ये तथा पितामह भीष्म भी मार डाले गए इसीलिए अब यह सूनी पृथ्वी तुम्हारी ही रहे ! मै सहायकों से रहित होकर राज्य शाशन की इक्छा नहीं करता हूँ ! में मृग चार्म धारण कर बन में चला जाऊंगा ! अपने पक्छ के लोगों के मारे जाने से अब इस राज्य में मेरा कोई अनुराग नहीं है !दुर्योधन और अर्जुन दोनों ही राज्य सुख भोग के त्याग की बात कह रहे हैं !किन्तु दोनों ही आसक्ति के बंधन के वशी भूत  होकर त्याग की बात कर रहे हैं !दुर्योधन राज्य की प्राप्ति सुख भोग के लिए पाना चाहत था !किन्तु पा ना सका इसीलिए राज्य सुख त्याग की बात कर रहा है !और अर्जुन अपने स्वधर्म का परित्याग स्वजनाशक्ति  के कारण कर रहा है !दोनों ही की शव्दों की अभिव्यक्ति एक  जैसी है किन्तु भावों में भिन्नता है !यही आसक्ति से ग्रस्त मनुष्यों की मूढता है ! 

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