गीता ज्ञान १(११)अयनेसु च सर्वेषु यथाभागम वसिथता --------दुर्योधन ने कहा इस समय भीष्मजी की रक्छा से बढ़कर दूसरा कोई कार्य में आवश्यक नहीं समझता हूँ ! क्योँकि बे सुरक्छित रहें तो बे कुंती के पुत्रों को छोड़ कर सोमकवंशियों तथा सृञ्जयों को भी मार सकते हैं ! विशुद्ध ह्रदय वाले पितामह मुझ से कह चुके हैं कि बे शिखंडी को नहीं मारेंगे क्योँकि वह पहले स्त्री था ! इसीलिए रणभूमि में वह उनके लिए त्याज्य है ! इसीलिए मेरा विचार है कि इस समय हमें विशेष रूप से भीष्मजी की रक्छा में तत्पर रहना चाहिए ! मेरे सारे सैनिक शिखंडी को मारने का प्रयत्न करें ! पूर्व, पश्चिम ,,दक्छिण तथा उत्तरदिशा के जो जो वीर हों बे ही पितामह की रक्छा करें ! यदि महाबली सिंह भी अरक्छित दशा में हो तो उसे एक भेड़िया भी मार सकता है ! हमें चाहिए कि सियार के समान शिखंडी के द्वारा सिंह सद्दृश भीष्म को ना मारने दें ! अर्जुन के रथ के वायें पहिये की रक्छा युधामन्यु और दायें की रक्छा उत्तमौजा कर रहे हैं ! अर्जुन को ये दो रक्छक प्राप्त हैं !और अर्जुन शिखंडी की रक्छा कर रहे हैं ! अतः भीष्म से उपेक्छित तथा अर्जुन से सुरक्छित होकर शिखंडी जिस प्रका भीष्म को ना मार सके वैसा प्रयत्न करो ! भीष्म पितामह ने दुर्योधन की सेना का सेनापति बनते ही यह स्पष्ट कह दिया था कि बे शिखंडी तथा पांडवों का युद्ध में वध नहीं करेंगे !
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