धम्मपद ब्राह्मण बग्गो गाथा ३८३------- हे ब्राह्मण ! तृष्णा के श्रोत्र को छिन्न कर दे ,पराक्रम कर कामनाओं को दूर करदे !हे ब्राह्मण !संस्कारों के छय को जानकर तू असंस्कृत निर्वाण का जानकार हो जा !ब्राह्मणों के लिए यही उपदेश महाभारत में भी दिया गया है !बिना तृष्णाछय और इंद्रियविजय के निर्वाण की प्राप्ति नहीं हो सकती है !निर्वाण सहज में बिना तृष्णाछय और इंद्रियविजय के नहीं होता है संसार में जो कुछ इस लोक के भोगों का सुख है और जो स्वर्ग का महान सुख है ,बे दोनों तृष्णा छय से होने वाले सुख की सोलहबीं कला के बराबर भी नहीं हैं ! यह बात व्यासदेव ने महाभारत में कही है 1 तिब्बत के बौद्ध धर्मग्रंथों में यहाँ तक कहा गया है कि यह महाभारत का श्लोक बुद्धात्तव प्राप्त होने पर बुद्धके मुंह से निकला था ! कामना ही तृष्णा ,शोक और परिश्रम इन सबका उत्पत्ति स्थान है ! जब तक ब्राह्मण इन से प्रेरित होकर इधर उधर भटकता रहेगा तब तक ब्राह्मणत्तव की प्राप्ति नहीे हो सकती है 1 ब्राह्मण यह समझ कर कामनाओं का त्याग कर दे कि काम तत्त्व ज्ञान से रहित है ! काम को संतोष देना कठिन है ! जिस प्रकार प्रज्ज्वलित अग्नि में घी की आहुति देने से अग्नि और तीब्र हो जाती है उसी प्रकार कामनाओं के भोग से कामनाएं और तीब्र हो जाती हैं 1 अग्नि के समान कामनाओं का पेट भरना असम्भव है ! निर्वाण के साधक को काम क्रोध ,लोभ ,तृष्णा और कृपणता का त्याग करना पड़ता है !इनके त्याग के बिना मोकछ प्राप्ति के लिए वैराग्य ,सुख ,शांति ,तृप्ति सत्य ,सम ,दम ,छमा और समस्त प्राणियों के प्रति दयाभाव ये सभी सद्गुण प्राप्त नहीं होते हैं 1मोक्छ या निर्वाण प्राप्ति के ये सभी साधन जिन ब्राह्मणो ने इंडियनिग्रह ,तृष्णा छय और कामनाओं के विनाश से प्राप्त कर लिए हैं बुद्ध उनको ब्राह्मण मानते हैं !बुद्ध धर्म पर तृष्णा और लोभ तथा काम वासनाओं से ग्रस्त मूढ़ गपोडीएऔर राजनैतिक उद्देश्य की प्राप्ति में संलग्न बुद्ध और बौद्ध धर्म की चर्चा करने वाले बुद्ध की दृष्टि से ब्राह्मणों को नहीं पहचान सकते हैं !
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