हिमालय की पवित्र तलहटी में पर्वतीय गुफा के भीतर धर्मात्मा व्यास जी ने
ध्यान योग में स्थित हो उन्होंने महाभारत इतिहास के स्वरुप का विचार करके
ज्ञान दृष्टि द्वारा आदि से अंत तक सब कुछ प्रत्यक्छ की भांति देखा! ! और
महाभारत ग्रन्थ की रचना की !इसके बाद व्यास जी यह विचार करने लगे की अब
शिष्यों को इस ग्रन्थ का अध्ययन कैसे कराऊँ ! तथा जनता में इसका प्रचार
कैसे हो !उसी समय गुफा में ब्रह्मा जी प्रगट हुए !उन्होंने ब्रह्मा जी से
कहा कि मेँ इस ग्रन्थ का प्रचार पृथ्वी में करना चाहता हूँ !किन्तु
मेने इस ग्रन्थ की जो रचना अपने मन में की है !उसको लिख सके ऐसा कोई
व्यक्ति मुझे दिखाई नहीं देता है !ब्रह्मा जी ने कहा तुम गणेश का आवाहन करो
बे इस ग्रन्थ का लेखन कार्य करेंगे !तदोपरांत व्यासजी ने गणेश जी का आवाहन
किया !गणेश जी ने कहा में इस ग्रन्थ का लेखक उसी सूरत में बन सकता हूँ
!जबकि लेखन कार्य बिना रुके चलता रहे !व्यास जी ने कहा की आप भी बिना अर्थ
ज्ञान के कुछ भी न लिखना !जब तक गणेश जी श्लोक के अर्थ पर विचार करते थे तब
तक व्यास जी दूसरे श्लोकों की रचना कर लेते थे !महाभारत में ऐसे ८८०० गूढ़
श्लोक हैं जिनका अर्थ या तो व्यास जी जानते है या सुखदेव !महाभारत की रचना
तीन साल में पूर्ण हुई थी !आधुनिक काल में कुछ धार्मिक सुधारकों ने
महाभारत की बहुत सी घटनाओ को काल्पनिक और बाद में जोड़ी गयी बताकर महाभारत
का अपनी मन मर्जी का संशोधित महाभारत भी लिख दिया है !किन्तु इन धार्मिक
सुधारकों ने अपनी मूढ़ता और अज्ञान के कारण महाभारत के स्वरुप को बिगड़ने का
काम किया है !क्योँकि जिन घटनाओ को ये लोग काल्पनिक कहते हैं !बे सभी
घटनाएं विज्ञान सिद्ध कर रहा है !गीता प्रेस गोरखपुर ने ही वैदिक संस्कृति
का सही और वास्तविक स्वरुप प्रस्तुत कर अत्यंत अल्प मूल में इस महान ग्रन्थ
को इसके मूल स्वरुप में प्रकाशित तथा प्रस्तुत किया है !गीता प्रेस ने
वैदिक संस्कृति की अनुपम सेवा कर वैदिक संस्कृति के प्रमुख धर्मग्रंथो को
इन तथाकथित अल्पज्ञ धार्मिक सुधारको की दृष्टि से रक्षा की है !
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