Saturday, 14 May 2016

शवद्ज्ञानियों की भरमार और कपटाचार में है दम्भ ,पाखण्ड ,झूठ अदि की जड़ और महती भूमिका -------
१---पढ़ने वाले ,पढ़ाने वाले तथा शास्त्रों पर प्रवचन देने वाले , उपदेशक , राजपुरुष आदि अधिकाँश व्यसनी और मुर्ख ही हैं पंडित तो वही है जो अपने कर्तव्य कर्म का पालन करता है -----युधिस्ठर
२---विद्वान पुरुष शिकार करने ,जुआ खेलने ,स्त्रीयों के संसर्ग में रहने और मदिरा पीने के प्रसंगों की बड़ी निंदा करते हैं परन्तु इन पाप कर्मों में अनेक शास्त्रों के श्रवण और अध्ययन से संपन्न पुरुष भी संलग्न देखे जाते हैं ---महाभारत
३ ---- बृद्धावस्था और मृत्यु के बस में पड़े हुए मनुष्य को औषधि ,मन्त्र ,होम ,और जप भी नहीं बचा सकते हैं
४---जैसे महासागर में एक काठ एक ओर से और दूसरा दूसरी ओर से आकर थोड़ी देर के लिए मिल जाते हैं तथा मिलकर फिर बिछुड़ जाते हैं ,इसी प्रकार संसार में प्राणियों के संयोग वियोग होते रहते हैं !
५---हमनें संसार में अनेक बार जन्म लेकर सहस्त्रों माता पिता और सेकंडों स्त्री पुत्रों के सुख का अनुभव किया है परन्तु बे सब अब किसके हैं ? अथवा हम उनमे से किसके हैं ?

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