धर्म नहीं श्रेष्ठता है समस्या !इस विषय को अन्य पहलू से भी समझा जा सकता
है !उत्क्रांति बाद का सिद्धांत भारत के बाहर पैदा हुआ है !जिसके अनुसार
मनुष्य का बर्तमान सभ्यता तक आने का इतिहास जंगली मानव से शुरू होकर यहाँ
तक पहुँचता है ! !वैदिक संस्कृति इसके विपरीत मानती है !आज जिस जीवन शैली
को श्रेष्ठ माना जाता है !वैदिक संस्कृति के अनुसार आज की जीवन शैली आदि
संस्कृति के विल्कुल विपरीत और पतन शील है !आधुनिक सभ्यता ने मनुष्य को
जीवन मूल्यों से बिहीन कर दिया है !आज का मनुष्य अत्यंत निकृष्ट
और स्वारथी तथा सम्बेदन हीन हो गया है !और अपना विनाश करने की ओर स्वयं
प्रवृत्त हुआ है !जबकि पूर्व बर्ती मनुष्य ऐसा नहीं था !तथा बर्तमान युग से
अधिक विकसित सुसंकृत और ज्ञान विज्ञान से युक्त था !वैदिक संस्कृति ने
श्रष्टि के काल को चार युगों सतयुग त्रेता द्वापर और कलयुग में विभाजित
किया है !और हर युग का काल और उस युग में उत्पन्न होने वाले मनुष्यों के
स्वभाव को भी बताया है !सतयुग के मनुष्य की आयु हजारों बर्ष की होती थी
!किसी भी मनुष्य को रोग आदि की व्याधि नहीं होती थी !सभी प्रकार के खाद्य
पदार्थ प्रकृति से सहज ही में प्राप्त होते थे !मनुष्यों के पास तीव्रगामी
विमान थे !जो बिना ईंधन के चलते थे !लोग झूठ छल कपट आदि से जीविका नहीं
चलाते थे !न कोई राजा था न जाति था !यह श्रेष्ठ युग वैदिक संस्कृति के
अनुसार माना जाता है !इसके बाद त्रेता द्वापर में मानव मूल्यों का क्रमिक
ह्राश होता चला जाता है !और बर्तमान काल जिसे कलयुग कहते हैं ! यह सबसे
निकृष्ट काल कहलाता है !इसका काल ऋषियों ने ४३२००० साल बताया है !और अभी
इसको आये मात्र ५२५० साल हुए है !इस युग में व्यक्ति के भोग की पूर्ति
प्रकृति के शोषण से होती है ! !हवाई जहाज जलयान मोटर वाहन आदि सभी भौतिक
ईंधन से चलते हैं !इसीलिए इनके लिए पृथ्वी को खोद खोद कर खोखला कर दिया
जाता है !इस विकास की अंधी दौड़ में सबकुछ उल्टा हो जाता है !और गलत को सही
और सही को गलत समझने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है !अधर्म को ही धर्म
समझते हैं !ओर लोग काल्पनिक व्याख्यायें श्रिष्टि के सम्बन्ध में करने लगते
हैं !श्रष्टि के विकास और विनाश का वास्तविक ज्ञान महाभारत वेद आदि
ग्रंथों में है !उसको पढ़ समझ कर यथार्थ ज्ञान से युक्त होकर ही ऐसे गंभीर
विषय की चर्चा में प्रवेश करना चाहिए !
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