Sunday, 1 May 2016

धर्म एक व्यापक शव्द है! जिस नीति विचार पर हमारा जीवन चलता है ,उसे हम धर्म कहत है !धर्म के चार चरण होते हैं ---श्रद्धा ,सत्य ,प्रेम और त्याग इनमे से श्रद्धा तो भरपूर दिखाई देती है! बाकी धर्म के तीन तत्त्व करीब करीब समाप्त हो गए हैं! अब धर्म सिर्फ श्रद्धा के एक पैर पर लड़खड़ाता हुआ चल रहा है! इसलिए बहुत धार्मिक आयोजनो ,मठ महंतो आश्रमों प्रवचनों के बाद भी धर्म कार्य में प्रगति नहीं दिखाई देती है!
केवल श्रद्धा के आधार पर धर्म खड़ा तो हो जाता है! पर उस से चलना दौड़ना नहीं बन सकता है! इसलिए धर्म के जो दूसरे चरण हैं उनको जाग्रत करना होगा ! धर्म का दूसरा चरण सत्य है! उसके बिना समाज का टिकना संभव नहीं है! आज कल लोग असत्य को ही सत्य मानते हैं! संपत्ति वैभव शक्ति को ही सत्य मान लिया है और व्यक्ति ने स्वयं को उसका मालिक मान लिया है !
जब्कि इस सबका मालिक व्यक्ति हो ही नहीं सकता है! सत्य यही है की इस सबका मालिक ईश्वर ही है! हमें इस सत्य की स्थापना करनी चाहिए! तीसरा चरण प्रेम है ! इसे दया भी कहते हैं! हम मौके मौके पर दया करते भी है ! किन्तु इसे नित्य धर्म नहीं बनाते हैं! घर में प्रेम है! व्योहार में गए की प्रेम ख़त्म एक दूसरे को ठगना शुरू कर देते हैं ! हर व्योहार के साथ पैसे को जोड़ दिया है! विद्वान लोग भी जितनी योग्यता रखते हैं उस से ज्यादा ही लूट खसोट करते हैं ! प्रेम का अर्थ है कि जितना प्रेम हम परिवार से करते हैं उतना ही प्रेम हम देश और समाज से करें ! सब पर प्रेम करना हमारा धर्म है ! चौथा चरण है ! त्याग बिना त्याग के समाज आगे नहीं बढ़ सकता है ! त्याग से ही लक्ष्मी की प्राप्ति होती है !त्यक्तेन भुंजीथाः ईशा वाष्य उपनिषद् के इन दो शब्दों में कहा गया है कि त्याग करो तो भोग की प्राप्ति होगी ! किसान एक दाना बोता है भगवान हजार दाने देते हैं ! जब तक मानव समाज में धर्म के इन चार चरणो का आबिर्भाव नहीं होगा तब तक सत्य अहिंसा आदि श्रद्धाएं रहेंगी किन्तु धर्म नहीं बनेगी !

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