विद्यार्थियोँ के लिए तो आदर्श वाक्य प्रेरक होते हैं !किन्तु कर्म करने
वालों को तो आदर्श बाक्य जीवन में उतारना चाहिए !ताकि आदर्श वाक्य और
आदर्श कर्म का समन्वय युवा पीढ़ी को आदर्श कर्मकरने की प्रेरणा प्रदान
करेगा !और इसी से आदर्श समाज का निर्माण होता है !नहीं तो आदर्श वाक्य
मात्र शब्दों की कसरत बनकर रह जाते हैं !और समाज अत्यंत छल और कपट युक्त
झूठा आचरण करने लगता है !प्रमाणिकता और सत्यनिष्ठा का नाश हो जाता है
!भारतीय समाज में इस प्रकार के दुहरे जीवन के मान दंड आज सर्वत्र दिखाई
देते हैं ! किन्तु स्वार्थोँ का घटा टॉप अन्धकार इतना गहरा है ! कि लोग
अपने छोटे से स्वार्थ पूर्ति के लिए समाज और विधान और सभी कुछ जिसे आदर्श
कहा जाता है समाप्त करते रहेंगे !समय का उलट फेर बड़ा विचित्र होता है !आज
छल कपट युक्त जीवन ही मनोवांछित फल प्रदान कराने में सहायक होता है !किन्तु
जो अच्छे शुद्ध जीवन की आवश्यकता देश और समाज के लिए तथा आने बाली पीढ़ी
के लिए ज़रूरी समझते हैं !बे सतत अपने नाम को मिटाने और समाज के बनाने में
लगे रहते हैं और लगे हुए हैं !
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