Tuesday, 31 May 2016

लोकतंत्र का स्वास्थ्य तथा सफलता निर्भीक और तटस्थ विचारों की अभिव्यक्ति से सिद्ध होती है !जिस लोकतंत्र में किसी एक विचार के विवेक शून्य अंधभक्तों का बाहुल्य हो जाता है !बे लोकतंत्र के सबसे बड़े शत्रु होते हैं !लोकतंत्र में सत्ता का प्रवाह जनसाधारण के अभिमुख होना चाहिए और जनसाधारण से प्रतिनिधित्त्व प्राप्त सामान्य व्यक्तियों का रहन सहन जनसाधारण के अनुरुप और आचरण शुद्ध और ईमानदारी तथा लोकहित को समर्पित  होना चाहिए !उनकी नीतियां देश और काल के अनुरुप होनी चाहिए !भारत से अधिक प्राचीन कोई और देश पृथवी पर नहीं है !इस देश की प्राचीन संस्कृति सत्य ,अहिंसा ,अपरिग्रह अस्तेय और ब्रह्मचर्य प्रधान रही है !ये संस्कृति के मूल तत्त्व हैं !संस्कृति बदलती रहती है किन्तु ये ये मुलतत्तव नहीे बदलते हैं !यास्क ने सनातन की ब्याख्या करते हुए कहा है सनातनो नित्य नूतनह (सनातन सदैव नवीन है वह कभी  पुरातन नहीं होता है ) इस देश में सभी विचारों और धर्मों का प्रवेश और पोषण हुआ है !वह सिर्फ इसीलिए सम्भव हो सका है क्योंकि यह हिन्दू धर्म अथवा वैदिक धर्म की विशेषता और विरासत है !इसीलिए इसकी रक्छा और सुरक्छा तथा इसके आदर्शों और मूल तत्तवों को जीवित रखने का उत्तर दायितव सभ धर्मों पर है !अगर वैदिक धर्म का आधार ही नष्ट हो गया तो नातो सर्वधर्म समभाव रहेगा और नाही पवित्र भूमि भारत में उत्पान्न ऋषियों ,महाऋषियों ,अवतारों की परंपरा ही कायम रहेगी !और ना ही महर्षि अरविंदो ,रमण गांधी ,विनोबा दयानन्द ,अदि का जन्म होगा !इन महापुरुषों की अनादि श्रृंखला का अभी तक नाश नहीं हुआ क्योंकि इनके जाने से भारत माता की गोाद सूनी हुई कोख सूनी नहीं हुई !           

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