समस्यायों का समाधान समयानुकूल साधनों और प्रयत्नों से ही होता है ---------- अगर हम समाज में समता स्थापित करना चाहते हैं !तो इसके लिए सिर्फ समता के लिए समर्पित महापुरुषों का स्मरण ,उनकी मूर्तियां लगाने आदि से समता प्राप्त नहीं कर सकते हैं !महापुरुषों के संघर्ष में त्याग और बलिदान की प्रमुख भूमिका होती है !उनके जीवन में अवकाश या भौतिक भोग सामग्री की प्राप्ति के प्रयत्नों का कोई स्थान नहीं होता है !उनका जीवन वायु और नदी के सामान लोकहित के लिए गतिमान होता है !जो लोग उनके इस कार्य से लाभान्वित होकर वैभव ,एशबर्य और सम्मान तथा सत्ता प्राप्त करते हैं !बे इन महापुरुषों की विषमता मुक्ति मुहिम को समाप्त कर स्वयं के उत्तरोत्तर विकास के लिए नियोजित करते हैं !ऐसे ही लोग इन महापुरुषों की मूर्तियां ,उनकी पुण्यतीतिथि और जन्मतिथि पर राष्ट्रीय अवकाश उनके पुण्यस्मरण के लिए विचार गोष्ठियों आदि का आयोजन करते रहते हैं !ये इतने धूर्त और चालाक तथा स्वार्थी होते हैं !कि इन आयोजनों के द्वारा भी बे अपनी स्वार्थ सिद्धि ही करते हैं !भारतीय समाज महापुरुषों की कर्तव्यनिष्ठा ,त्याग और बलिदान की भावना अपने आचरण में उतारने वाले लोगों के सतत निष्काम कर्त्तव्य निष्ठां से ही विषमता और अन्याय से मुक्त होगा !
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