मित्र के साथ द्रोह को गीता में महान पाप बताया गया है ! कुल के नाश को दोष
कहा है !अर्थात मित्र का स्थान कुल (परिवार और खून के सगेसंबंधों) से भी
अधिक महत्त्व का बताया गया है !सच्चे मित्र दुर्लभ होते हैं !सच्चे मित्रों
के लक्छण समय और परिश्थित के अनुसार स्थूल दृष्टि से एक से नहीं रहते हैं
!बहुत से कपटी मित्र भी स्वार्थ बश आचार्य चाणक्य द्वारा बताये गए लक्छणो
का स्वार्थ दृष्टि से पालन कर सकते हैं !ओर संकट के समय या स्वार्थ पूर्ति
के बाद मित्र का साथ छोड़ सकते हैं !मित्रता के मान दंड
सामर्थ समय और परिस्थित के अनुसार बदलते भी हैं और नहीं भी बदलते है
!इसमें मित्र नामक व्यक्ति की नीति और धर्म में गहरी आस्था काम करती है!
!महाभारत के कर्ण और दुर्योधन की मित्रता इसी प्रकार की थी !दुर्योधन की
मित्रता की दृष्टि घोर स्वार्थ प्रधान थी ! किन्तु कर्ण की मित्र दृष्टि
धर्म और नैतिकता से जुडी हुई थी !द्रुपद और द्रोणाचार्य की मित्रता द्रुपद
की दृष्टि में सामर्थ्य में समानता पर आधारित थी जबकि द्रोणाचार्य की
मित्रता धर्म और नीति युक्त थी !इसीलिए द्रुपद द्वारा अपमानित होने के बाद
भी द्रोणाचार्य ने उस पर शक्ति का प्रयोग नहीं किया ! और अर्जुन द्वारा
पराजित द्रुपद जब उनके सामने लाया गया तो उन्होंने उसे मित्रता का निर्बाह
करते हुए आधा राज्य लेकर जीवित छोड़ दिया था !किन्तु द्रुपद ने यज्ञ से
द्रोणाचार्य का बध करने वाला पुत्र उत्पन्न किया था !ऐसा भी इतिहास में
उल्लेख मिलता है कि शक्ति पाकर चन्द्रगुप्त भी आचार्य की अबज्ञा करने लगा
था !इसीलिए सच्ची मित्रता का पता सिर्फ संकट काल में ही चलता है !किन्तु
संकट किसी के भी जीवन में कभी कभी अचानक ही आता है !इसीलिए इस युग में
आत्मविश्वास ही सबसे बड़ा मित्र है
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