संसार में पशु पक्छी और मनुष्य साथसाथ रहते हैं ! कुछ बातें इन में समान
होती हैं ! लेकिन कुछ बातें मानव के जीवन में विशेष होती हैं ! उन्ही
बातों में एक विशेष बात है मानव की धर्म भावना ! मनुष्य को हमेशा अंदर से
एक आवाज आती रहती है कि उसका व्योहार ठीक हो रहा है या नहीं ? किसी ने खूब
संपत्ति इकट्ठी की ! और पैसे के कारण जीवन में उसे जनता में आदर और
प्रतिष्ठा भी प्राप्त हो गयी ! उसका जीवन भी भोग ऐश्वर्य से पूर्ण हो गया !
फिर भी उसके चित्त में अशांति रहती है ! तो फिर मनुष्य के चित्त
का समाधान किस से होता है ?यह सोचने खोजने का विषय हो जाता है ?इस से यह
मालूम होता है ! जैसे मनुष्य में भोग ऐश्वर्य की बृत्ति है वैसे ही दूसरी
बृत्तियां भी मौजूद हैं ! केवल भोग ही नहीं धर्म वासना और धर्म प्रेरणा भी
मनुष्य में बड़ी बलबान होती है !किन्तु अधिकांश मनुष्य आज कल धर्म प्रेरणा
से प्रभावित तो हो रहे हैं ! किन्तु प्रधानता भोग और ऐश्वर्य को दे रहे हैं
! किन्तु प्राचीन काल में धर्म का प्रयोग हमेशा ही भोग और यैश्वर्य की
वासनाओ को अंकुश में रखने के लिए होता रहा है ! आज भी मनुष्योँ को धर्म का
उपयोग भोग ऐश्वर्य प्राप्ति की वासनाओ पर अंकुश लगाने के लिए करना चाहिए !
यदि व्योहार के छेत्र में धर्म के लिए गुंजायश ही न हो तो फिर धर्म रहेगा
कहाँ ?यदि मठ मंदिर गुरुद्वारों मस्जिदों चर्चों आदि में ! धार्मिक प्रवचन
करने वालों में, साधुओं मौलवी पादरियौ आदि में ,उसी प्रकार राजनीति में
व्यापार आदि में धर्म का व्योहार नहीं होगा ,उसको अछूत समझा जाएगा तब वह
धर्म नहीं अधर्म होगा ! जब धर्म जीवन के सभी छेत्रों में प्रवेश कर व्योहार
को शुद्ध करने का काम करे ! और व्योहार के सभी नाकों पर उसका वर्चस्व हो !
तभी धर्म का कुछ सार्थक अर्थ होगा ! धर्म और व्योहार की जोड़ी किसी भी
परिश्थिति में टूटनी नहीं चाहिए ! दोनों का मेल होना चाहिए ! बल्कि मेल
करा देना चाहिए ! धर्म का व्योहार से मेल करना धर्म और व्योहार दोनों की
दृष्टि से अपरिहार्य है ! किन्तु इस मेल का अर्थ व्योहार की तरह धर्म को
पतित करने का नहीं बल्कि व्योहार को पवित्र और पावन करने के लिए होना
चाहिए !
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