मजदूरी बढ़ी है ! तो है मजदूर मगन कल से हो जाएगा बाजार में महंगा राशन -------- उच्च शिक्छा प्राप्त मेहनतकश मजदूर की तरह जीवन जीने वाले लोहियाजी ने दाम बांधो का नारा दिया था !मजदूरी बढ़ाने का नहीं ! गांधी जी और विनोबा जी ने भी जीवन भर अथक श्रम किया और मजदूरों जैसा जीवन जीया था !एक समय विनोबा जी का प्रतिदिन का खर्च मात्र कुछ पैसे ही था !और जीवन के अंत में भी उनका खाने का खर्चा तीन रुपया प्रतिदिन था !उन्होंने अपनी जवानी के दिन मजदूरी करते हुए ही बिताए थे !उन्होंने ३२ साल तक मजदूरी की थी !उन्होंने उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया था !बो कहते थे लक्छमी आटा ,दाल ,चावल ,घी दूध ,मक्खन सब्जी ,कपास अदि है !कागज का रुपया लक्छ्मी नहीं है !कागज़ का रुपया तो नासिक में सरकारी प्रेस में छपता है !उसको मन मर्जी के मुताबिक़ छापा जा सकता हैं !किन्तु लक्छमी तो मानव श्रम और भूमि से पैदा होती है !रुपया लफंगा है !उसका आंतरिक मूल्य शुन्य है !उसको तो समुद्र में डुबो देना चाहिए !लक्छमी की बृद्धि तो उत्पादन से ही होगी !देश में उलटी विकास की गंगा बहाई जा रही है !उत्पादन करने वाला किसान आत्महत्या कर रहा है !और मजदूरी बढ़ाने की मांग करने वाले गपोडिये कामचोर ,भासण कुशल लोग रुपयों में मजदूरी बढ़ाने की मांग कर रहे हैं जुलूस निकाल कर नारे बाजी कर रहे हैं ! इन राज्य कर्मचारी और मजदूर समर्थक नेताओं के यदि व्यक्तिगत जीवन पर दृष्टि डाली जाय तो मालुम पड़ेगा की ये बोलोग हैं जिन्होंने अपने कर्तव्यों का कभीे भी पालन नहीं किया !सिर्फ बहसबाजी करते रहे और मुफ्त की तनख्वाह लेते रहे !सारे जीवन कामचोरी का उदाहरण प्रस्तुत कर मजदूरों का शोषण करते रहे !चाहे मजदूर हो या आम आदमी हो इनकी आर्थिक समस्याओं का समाधान तो श्रम और भूमि से उत्पन्न पदार्थों से ही होगा !रुपयों में मजदूरी बढ़ाने से नहीं हो पाएगा !विकास को सही दिशा में लाने के लिये तत्काल रुपयों की महत्ता को समाप्त कर उत्पादक श्रम को महत्ता प्रदान करने कासिलसिला शुरू होना चाहिए !सभी प्रकार की सेवाओं का मूल्यांकन परिणाम के आधार पर होना चाहिए !प्रमाद ,आलस्य अदि की विदाई सार्वजानिक जीवन से कर देनी चाहिए !सभी श्रमों का मूल्य समान होना चाहिए !खेत में काम करने वाले कृषक और उद्द्योग चलाने वाले उद्दोगपति ,राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री आदि को भी सिर्फ जरूरत के अनुसार ही सुविधाएँ ,बेतन आदि दिया जाना चाहिए !जनता के धन को सौगात की तरह बांटने वाले राजनेताओं और भासण कुशल मजदूर नेताओं के पास मजदूरों की समस्याओं का समाधान ना कभी था और ना आज भी है !लोगों कोअपनी खुली आँखों से ,दिल .और दिमाग से बाजारों में उपलब्ध रुपया कमाने की होड़ में लगे व्यापारियों द्वारा नकली खाद्य पदार्थों की विक्री .पदार्थों के अभाव,और निरन्तर बढ़ती हुई महगाई पर ध्यान देना चाहिए !मजदूरी रुपयों में बढ़ाने के स्थान पर दाम बांधने पर जोर देना चाहिए !भारत का सनातन आर्थिक विषमता से मुक्ति का श्रम और भूमि से उपार्जित लक्छमी बृद्धि का यह सन्देश क्रियांबित करना चाहिए !इस सन्देश के लिए किसी दिन विशेष की आवश्यकता नहींहै !यह सतत धारण किये रहने की प्रक्रिया है !
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