Tuesday, 31 May 2016

शाश्त्र विधियों का निर्माण अनुभव के आधार पर होता है !और समय और परिश्थित के अनुसार इन विधियों में शोध और नए नए अनुभवों के आधार पर बदलाव भी होता रहता है !किन्तु मूल लोकहित की बात कायम रहती है !भोजन भवन निर्माण आदि के सम्बन्ध में बहुत सी लोक कल्याणकारी व्यबस्थाएं भारतीय धर्म ग्रंथों में विद्यमान है !भवन निर्माण में वास्तुशास्त्र के अनुसार निर्माण करने से बहुत सी विपदाओं का निराकरण हो जाता है !किन्तु आज जो विशाल भवनो या भवनो का निर्माण हो रहा है !उसमे अधिकाँश में वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन नहीं हो रहा है !तथा लोग बने हुए मकानो को खरीदने के लिए विवस हैं !अब भवन निर्माण के पूर्व विधि विधान से भूमि का पूजन भी नहीं होता है !इसीलिए वास्तुशास्त्र के नियमों के विरुद्ध निर्मित भवनो से होने वाली विपदाओं से निबृत्ति के अन्य बहुत से उपाय शाश्त्रों में बताये गए हैं !उनके पालन से भी संकटों से मुक्ति हो जाती है !भोजन के मामले में तो स्वस्थ्य वर्धक सारे नियमों का परित्याग हो गया है !परिणाम स्वरुप संपूर्ण समाज गंभीर और साधारण रोगों से ग्रस्त हो गया है !वैदिक धर्म में भोजन पकाने भोजन के पदार्थों को शुद्ध करने भोजन करने के समय के आसान भोजन के समय मन बुद्धि चित्त आदि की स्थति आदि का बहुत मूलयवान विधान प्रस्तुत किया गया है !किन्तु इन विधानों का पालन बहुत कम लोग करते देखे जाते हैं !मनुष्य के जीवन में बहुत सी हिन्शात्मक स्वार्थ प्रधान समाज में बिघटन कारी प्रवृत्तिओं का जन्म अशुद्ध भोजन के कारण ही हुआ है !भोजन से ही प्राणियों के विचार और व्योहार का निर्माण होता है !उत्तम मध्यम और अधम भोजन के पदार्थ किस प्रकार के होते हैं !और उनके खाने से मनुष्य के शरीर और अन्तः करण का उत्तम और अधम निर्माण किस प्रकार से होता है ! इसका विवरण श्री मद भगवद गीता में १७(८,९,और १०) में किया गया है !यहाँ इस लेख में भी भोजन करने के अत्यंत उपयोगी नियम बताये गए हैं !

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