बुद्ध पूर्णिमा ----- भगवान बुद्ध और भगवद गीता ------- जितना नुक्सान धर्मिकपाखण्डियों ने धर्म का किया है !उतना नुकसान तो धर्म और ईश्वर को नकारने वाले नास्तिकों ने भी नहीं किया है !ये पाखंडियों का ही करिश्मा है की एक धर्म को दूसरे धर्म से लड़ा देते हैं !ऐसे पाखंडी जब तक जनसमाज के धर्मनिर्देशक और श्रद्धा के पात्र रहेंगे तब तक धर्म अपनी अहिंसक ,लोक कल्याणकारी और आत्मदर्शन का अनुभव कराने वाली शक्ति से वंचित रहेगा !बुद्ध को ऐसे हेी धर्मध्वजी लोगों ने सनातन धर्म के विरुद्ध खड़ा कर दिया है !जिन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया है उन्होंने बौद्ध धर्म के चरित्र निर्माण के अंतरंग साधनों की साधना करने के स्थान पर उसको ब्राह्मणो और हिन्दू धर्म पर हमले का माध्यम बन लिया है !बुद्ध की कोई भी सीख वैदिक धर्म के विरुद्ध नहीं है !उन्होंने रुग्ण वैदिक धर्म की चिकित्सा कर उसे उत्तम स्वास्थ्य प्रदान किया है !यही कार्य भगवान् श्री कृष्णा ने भी बुद्ध के जन्म से ढाई हजार साल पहले किया था !बुद्ध ने यज्ञ के विकृत रूप पर प्रहार किया यही कार्य भगवान् श्री कृष्णा ने भी किया था !बुद्ध ने ब्राह्मण को गुण प्रधान माना है जाति और जन्म से नहीं यही बात श्री कृष्ण ने भी गीता में कही है ! बुद्ध की एक भी सीख हिन्दू धर्म के मूलतत्तवों के विरोध में नहीं है !बुद्ध की मृत्यु हिन्दू के रूप में हुई थी और उनके अंतिम संस्कार भी सभी हिन्दू धर्म के अनुसार ही हुए थे !बुद्ध धर्म उनके निर्वाण के बाद शुरू हुआ और वह भी कालांतर में हीनयान और महायान शाखाओं में विभक्त होगया !बौद्ध धर्म का सर्वाधिक स्वीकृत धर्म ग्रन्थ धममपद है ! उसके भिक्खु बग्गो की गाथा २१ में बुद्ध कहते हैं ---मनुष्य अपना स्वामी आप है ,अपना शरण स्वयं आप है ,इसीलिए जैसे व्योपारी अपने भद्र घोड़े को अपने संयम में रखते हैं वैसे ही भिक्छु को अपने आप को नियंत्रित रखना चाहिए !यह शरीर अपना है जीभ अपनी है मन अपना है इसका नियंत्रक कोई दूसरा कैसे हो सकता है ?राग ,द्वेष ,मोह आदि क्लेश भी अपने ही हैं संस्कार अपने हैं और कर्म भी अपने हैं उन्हें कौन दूसरा भोगेगा ?उसे कौन दूसरा नष्ट कर सकता है ?जो ग्रहण करना चाहिए था उसे अज्ञान बस ग्रहण नहीं किया और जिसे ग्रहण नहीं करना चाहिए था उसे ग्रहण किया इसी कारण हम सब दुःख भोगते हैं !दुःख का कारण अज्ञान ,तृष्णा अदि क्लेश हैं !और सुख के कारण दया ,करुणा,मुदिता ,अहिंसा और अनासक्ति आदि हैं !यही बात भगवान् श्री कृष्ण गीता में ६(५,६) में कहते हैं ------अपने द्वारा अपना उद्धार करे ,अपना पतन ना करे ,क्योंकि आप ही अपना मित्र और आप ही अपन शत्रु है !जिसने अपने आपसे अपने --- आपको जीत लिया है ! उसके लिए आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने आप को नहीं जीता है ,ऐसे अनात्मा का आत्मा ही शत्रुता में शत्रु की तरह बर्ताव करता है !आप ही अपना मित्र बनकर मनुष्य अपना जितना भला कर सकता है उतना दूसरा कोई नहीं कर सकता है ! इसी प्रकार आप ही अपना शत्रु बनकर मनुष्य अपना जितना नुकशान कर सकता है उतना दूसरा कोई शत्रु नहीं कर सकता है ! ,
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