विश्व के सभी धर्मों को अपने धर्म ग्रंथों से उन उपदेशों को निकाल देना
चाहिए जो किसी भी रूप में हिंसा का समर्थन करते हों ! या हिंसा करने के लिए
प्रेरित करते हों !कोई भी धर्मग्रन्थ आगामी समय की बदली हुई परिश्थिति में
अपने समय की विधियों और नियमो के आधार पर सही और सटीक निर्णय नहीं दे सकता
है !और न ही कोई धर्म ग्रन्थ कर्म छेत्र की गतिविधियों को संचालित करने का
अंतिम मार्ग दर्शक धर्म ग्रन्थ हो सकता है !और कोई धार्मिक समूह यदि ऐसा
मानता है कि जो कुछ उसके धर्म ग्रन्थ में लिखा है ! वही
अंतिम सत्य है! तो उसका सामंजस्य युग की परिस्थिति के अनुकूल अन्य धर्म के
मानने वालों के साथ नहीं हो सकता है !और यदि उसका धर्म धर्म के नाम पर
हिंसा की इजाजत देता है तो वह अपने धर्म से अन्य धर्म के मानने वालों का
क़त्ल आदि कर सकता है ! धर्म के नाम पर हिंसा का बीभत्स खेल इस समय इस्लाम
धर्म में दिखाई दे रहा है !धर्म के नाम पर अत्यंत खू खार धार्मिक संगठन
आजकल मुसलमानो के इस्लामिक और गैर इस्लामिक मुल्को में क्रियाशील दिखाई दे
रहे हैं !समाचार पत्रों की सुर्खियां इस्लामिक संगठन बोकोहराम आदि की क्रूर
और अमानवीय क्रियायों से भरी रहती हैं !बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी इन
घटनाओ का जोर दिखाई देता है !पाकिस्तान में सुन्नी संगठन सिया अहमदिया
बोहरा मुसलमानो पर आक्रमण कर उनकी नृशंष हत्याएं करते रहते हैं !यह घटना भी
जिसमे ४५ सिया मुसलमान मौत के घाट उतार दिए गए हैं धार्मिक संकीर्णता का
परिणाम है !विश्व शांति और प्राणिमात्र की सुरक्षा के लिए हिंसा रहित धर्म
की आवश्यकता है !आज के युग की यही मांग है !अहिंसा सिर्फ श्रेष्ठ धर्म ही
नहीं निकट का और तुरत आचरण में उतारने का भी धर्म है
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