Sunday, 22 May 2016

इस आख्यान में अध्यात्म प्राप्ति की महत्त्व पूर्ण दृष्टि प्राप्त करने की साधना का शिक्छण प्राप्त होता है ! नचिकेता के पिता विश्वजीत नामक यज्ञ तो कर रहे थे !किन्तु विश्वजीत यज्ञ के लिए जो निष्काम भाव से यज्ञ करने का आतंरिक भाव है ! उसको वह अपने अन्तः करण में पूरी तरह से उत्पन्न नहीं कर सके थे !विश्वजीत यज्ञ में जैसा की श्री मद भगवद गीता १७(११)में कहा गया है! कि यज्ञ करना ही कर्तव्य है ----इस तरह मन को संतुष्ट करके फलेक्छा रहित मनुष्य द्वारा जो शाश्त्र विधि से यज्ञ किया जाता है ! वह श्रेष्ठ यज्ञ होता है अर्थात उस यज्ञ से आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है !इस विश्व जीत यज्ञ में शाश्त्र बिधि का तो पालन हो रहा था !किन्तु सर्वस्व त्याग के भाव का अभाव था !यज्ञ में जिन गायों का दान किया जा रहा था बे वृद्ध थी और दूध भी नहीं देती थी !नचिकेता ने अपने पिता का इस महत्त्व पूर्ण भूल के लिए ध्यान दिलाया !और कहा की इस यज्ञ में सभी प्रिय वस्तुओं का दान करना पड़ता है !इसलिए आप मुझे किसे दान में देंगे !नचिकेता के पिता को क्रोध आगया और उन्होंने कह दिया तुझे में यम को देता हूँ !यमराज ने भी नचिकेता को अनेक प्रलोभन भौतिक सुख प्राप्ति के लिए बरदान मांगने के लिए दिए !किन्तु आत्मज्ञान का बरदान प्राप्त करने के लिए वह संकल्पित रहा !और अंत में मजबूर होकर यमराज को उसे आत्मज्ञान देना पड़ा !आत्मज्ञान अर्थात अध्यात्म ज्ञान प्राप्ति के लिए साधक भक्त को मनसा बाचा कर्मणा कामनाओं से मुक्त होना पड़ता है !और आत्म संतुष्टि को ही अपनी साधना का ध्येय बनाना पड़ता है ! तभी उसे आत्मज्ञान प्राप्त कराने वाली प्रज्ञा की प्राप्ति होती है !और तभी वह स्थितप्रज्ञ अर्थात आत्मनिष्ठ कह लाता है ! !भगवान श्री कृष्णा ने आत्म ज्ञान निष्ठां की प्राप्ति के लिए २(५५)में कहा है! कि जिस समय मन में आई संपूर्ण कामनाओं का त्याग हो जाता है ! और आत्म संतुष्टि ही एक मात्र ध्येय बन जाता है !उसी समय साधक भक्त को अध्यात्म निष्ठ बुद्धि की प्राप्ति होती है !

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