जिस तरह से पृथ्वी को खोखला किया जारहा है !भूमि को ब्रक्छ बिहीन किया जा
रहा है १नदियोन को प्रदूषित और बालू से रिक्त किया जा रहा है !अधर्म को ही
धर्म समझा जा रहा है !जब यह धारा देश में बेग से प्रवाहित होने लगाती है
!तब प्रकृति का प्रलयंकारी विनाशक रूप प्रगट होने लगता है !इस समय मनुष्य
अत्यंत अबांछनीय कामनाओ के बस होकर उनका गुलाम हो गया है !इसीलिए यह भोग का
दुष्चक्र अभी रुकेगा नहीं और ना ही प्राकृतिक विपदाएँ रुकेंगी !इन भोगियोँ
के कारण आम आदमी भी विपदाओं का शिकार होगा !किन्तु जो इस अत्यंत विकट
परिश्थिति में अपने कर्तव्योँ का निष्ठापूर्वक पालन कर भगवान का स्मरण करते
हुए अपना जीवन जिएंगे बे इस संकट में भी जीवित और सुरक्छित रहेंगे !मनुष्य
निर्मित सभी साधन व्यर्थ सिद्ध होंगे !व्यापक विनाश की और हम अपने
कुकर्मों के कारण तीब्र गति से बढ़ रहे हैं !काल की कराल गति को सद्बुद्धि
ही रोक सकती है !जिसका मुह भोग बुद्धि के कारण बंद हो गया है
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