Monday, 23 May 2016

सूर्य की उपासना से ही युधिस्ठर ने अक्छय पात्र की प्राप्ति की थी !भगवान सूर्य ने युधिस्ठर की उपासना से प्रसन्न होकर उन्हें ताम्बे की बटलोई दी थी !उस बटलोई में फल मूल भोजन करने के योग्य अन्य पदार्थ तथा साग आदि जो चार प्रकार की भोजन सामग्री तैयार होती थी ! वह पात्र के प्रभाव से बढ़ जाती थी ! और अक्छय हो जाती थी !उस से कितने भी मनुष्य भोजन करें वह समाप्त नहीं होती थी !सबको भोजन कराने के बाद शेष अन्न द्रौपदी स्वयं खाती थी !उसके भोजन करने के बाद उस पात्र का अन्न समाप्त हो जाता था !जब पांडव बनबास में थे ! तब ऋषि धौम्य ने यह उपासना युधिस्ठर को बताई थी !युधिस्ठिर ने गंगा जी के जल में स्नान करके पुष्प और नैवेद्य आदि उपहारों द्वारा सूर्य भगवान की पूजा की ! और उनके सम्मुख मुह करके खड़े हो गए ! गंगा जल का आचमन करके पवित्र हो उन्होंने अष्टोत्तर शतक नामक स्त्रोत्र का जाप किया ! जो मनुष्य सूर्योदय के समय भली भांति एकाग्र चित्त हो सूर्य के इन नामो का पाठ करता है ! वह स्त्री पुत्र धन रत्न पूर्वजन्म की स्मृति धैर्य तथा उत्तम बुद्धि को प्राप्त कर लेता है ! वह शोक रूपी दाबानाल से युक्त दुस्तर संसार सागर से मुक्त हो मनचाही बस्तुओं को प्राप्त कर लेता है ! जो सप्तमी अथवा षष्ठी को भक्ति भाव से सूर्य की पूजा करता है ! उस मनुष्य पर लक्ष्मी जी की अपार कृपा रहती है !सूर्य उपासना का यह संपूर्ण विधान महाभारत में है !

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