१----- बहुत से मनुष्य पेट पालने के लिए मूड मुड़ाकर गेरुए वस्त्र पहन लेते हैं और गृहत्याग देते हैं ! बे विविध प्रकार के भोगों की प्राप्ति के लिए भटकते रहते हैं और संन्यास की पवित्र परपरा का नाश कर अधमगति को प्राप्त होते हैं !
२----बहुत से मुर्ख मनुष्य कृषि ,गोरकछा वाणिज्य जीविका के साधन तथा अपने घर परिवार का परित्याग कर चल देते हैं और त्रिदण्ड एवं भगवा वस्त्र धारण कर लेते हैं !
३----यदि ह्रदय के राग द्वेष अदि दूर ना हुए हों तो गेरुआ वस्त्र धारण करना स्वार्थ साधन का प्रयत्न ही समझना चाहिए धर्म का ढोँग रखने वाले मुथ मुंडों के लिए यह जीविका चलाने का एक धंधा मात्र है !
4-----जिसने बाहर से सन्यास आश्रम ग्रहण कर लिया है वह वास्तव में सन्यासी नहीं है ! सन्यासी वास्तव में वह है ,जिसने भीतर से राग द्वेष से मुक्ति पा ली है ! राग द्वेष के रहते हुए मनुष्य संसार बंधन से मुक्त नहीं हो सकता है ! जिसने राग द्वेष का त्याग कर दिया है वह सुख पूर्वक संसार के सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है ! जिसके भीतर राग द्वेष नहीं है वह कर्मयोगी कर्मों का त्याग ना करते हुए और सम्पूर्ण लोकहित के निष्काम कर्म करते हुए भी सदा सन्यासी ही है ! उसे आत्मकल्याण के लिए बाहर से संन्यास ग्रहण करने की किंचित मात्र भी आवश्यकता नहीं है ! ज्ञान योगी सिर्फ अपने लिए उपयोगी होता है परन्तु कर्मयोगी संपूर्ण समाज के लिए उपयोगी होता है ! भगवान् श्री कृष्ण ने ५(३) में कहा है जो मनुष्य ना किसी से द्वेष करता है और ना किसी की आकांछा करता है वह कर्मयोगी सदा सन्यासी ही है ! क्योंकि द्वन्दों से रहित मनुष्य सुख पूर्वक संसार के समस्त वन्धनों से मुक्त हो जाता है !
२----बहुत से मुर्ख मनुष्य कृषि ,गोरकछा वाणिज्य जीविका के साधन तथा अपने घर परिवार का परित्याग कर चल देते हैं और त्रिदण्ड एवं भगवा वस्त्र धारण कर लेते हैं !
३----यदि ह्रदय के राग द्वेष अदि दूर ना हुए हों तो गेरुआ वस्त्र धारण करना स्वार्थ साधन का प्रयत्न ही समझना चाहिए धर्म का ढोँग रखने वाले मुथ मुंडों के लिए यह जीविका चलाने का एक धंधा मात्र है !
4-----जिसने बाहर से सन्यास आश्रम ग्रहण कर लिया है वह वास्तव में सन्यासी नहीं है ! सन्यासी वास्तव में वह है ,जिसने भीतर से राग द्वेष से मुक्ति पा ली है ! राग द्वेष के रहते हुए मनुष्य संसार बंधन से मुक्त नहीं हो सकता है ! जिसने राग द्वेष का त्याग कर दिया है वह सुख पूर्वक संसार के सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है ! जिसके भीतर राग द्वेष नहीं है वह कर्मयोगी कर्मों का त्याग ना करते हुए और सम्पूर्ण लोकहित के निष्काम कर्म करते हुए भी सदा सन्यासी ही है ! उसे आत्मकल्याण के लिए बाहर से संन्यास ग्रहण करने की किंचित मात्र भी आवश्यकता नहीं है ! ज्ञान योगी सिर्फ अपने लिए उपयोगी होता है परन्तु कर्मयोगी संपूर्ण समाज के लिए उपयोगी होता है ! भगवान् श्री कृष्ण ने ५(३) में कहा है जो मनुष्य ना किसी से द्वेष करता है और ना किसी की आकांछा करता है वह कर्मयोगी सदा सन्यासी ही है ! क्योंकि द्वन्दों से रहित मनुष्य सुख पूर्वक संसार के समस्त वन्धनों से मुक्त हो जाता है !
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