इन स्थूल कथाओं के रूप में भगवान श्री कृष्णा का भगवद स्वरुप प्रदर्शित किया गया है !ये सब कथानक भगवान के अवतरण के हेतु को पुष्ट करते है !इनको समझने के लिए आध्यात्मिक रथ पर सवार होकर आत्मा की शक्ति और सौंदर्य को समझने के लिए आत्मसाधना करनी होगी !और जो लोग भौतिक दृष्टि से इन कथाओं को सुनते हैं !उन्हें भी अपनी समझ विक्सित करनी होगी कि कोई भी देहधारी मनुष्य विवाहित ८पत्नियो के अतिरिक्त १६००० युवतियोँ को शारीरिक शुख प्रदान नहीं कर सकता है !भगवान सूत्र रूप में गीता में ४(९,१०)में कहते हैं कि मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं जो मनुस्य तत्त्व से जान लेता है ! वह शरीर का त्याग करके मुझे ही प्राप्त होता है ! उसका पुनर्जन्म नहीं होता है ! राग भय और क्रोध से सर्वथा रहित मेरी भक्ति में तल्लीन तथा ज्ञान रूप तप से पवित्र हुए बहुत से भक्त मेरे स्वरुप को प्राप्त हो चके हैं ! श्लोक ८ में कहते हैं कि साधुओं की रक्षा करने के लिए और पापियों का विनाश करने के लिए और धर्म की भलीभांति स्थापना करने के लिए में युग युग में प्रगट होता हूँ !कृष्णा की प्राप्ति काम मुक्ति से होती है भोग प्रधान जीवन से नहीं
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