भारत श्रष्टि काल से ही धार्मिक देश रहा है !भारत की बुनियाद ही धर्म पर आधारित है !यहाँ ऋषियों मुनियों साधु सन्यासियों की अवाध श्रंखला अवाध गति से प्रवाहित होती रही है !इस भूमि पर ईश्वर ने भी अनेक रूपों में अवतार ग्रहण किये हैं !और आत्मा की खोज जितनी इस पवित्र भूमि भारत में हुई है !उतनी विश्व के अन्य किसी देश में नहीं हुई है !बर्तमान समय के दो सर्वाधिक धर्म ईसाई और इस्लाम में भी वैदिक संस्कृति के सनातन तत्त्व विद्यमान है !वैदिक संस्कृति के मूल तत्त्व सत्य अहिंसा अपरिग्रह ब्रह्मचर्य और अस्तेय हैं !इन्ही तत्त्वों के आधार पर सारी वैदिक संस्कृति और वैदिक धर्म विकसित हुआ है !अध्यात्मनिष्ठा में ईश्वर के साक्छात कार के लिए शरीर को माध्यम माना गया है !इसिलीए काम लोभ लालच आसक्ति आदि जो आध्यात्मिक जीवन में बाधाएं उत्पन्न करती है !उनके शोधन और निवारण के लिए विविध साधनाएं वैदिक धर्म में अपनायी गयी हैं !इस सम्बन्ध में विभिन्न धर्मग्रन्थ लिखे गए हैं !तथा परमात्मा की उपासना के भक्तियोग , ज्ञान योग और कर्मयोग के मार्ग भी निर्देशित किये गयेहैं !और ईश्वर को समग्र रूप को सगुण साकार सगुण निराकार निर्गुण निराकार आदि रूपों में प्रस्तुत किया गया है !धार्मिक उदारता और सर्वसमावेशी धर्म को मान्यता देने वाले वैदिक धर्म की छत्र छाया में इस देश माँ बाहर से आगंतुक धर्म इस्लाम और ईसाई धर्म को भी विकसित होने के पूर्ण अवसर प्राप्त हुए हैं !मंदिर में ईश्वर दर्शन तीर्थ भ्रमण और पवित्र नदियों गंगा जमुना सरस्वती कावेरी नर्मदा गोदावरी आदि नदियों में स्नान कर शरीर शुद्ध करने की अवाध परम्परा अनादि कल से भारत में प्रचिलित है !भगवान श्री राम के जीवन चरित्र में भी ऋषियों मुनियों के आश्रमों में उनका दर्शन कर उनके पूजन आदि के अनेक प्रसंग रामायण में वर्णित है !इसी प्रकार से महाभारत में भी पांडवों द्वारा बनवासकाल में अनेक ऋषियों मुनियोँ और नदियों कुंडो आदि में स्नान के अनेक प्रसंग विस्तार से बताये गए है !बलराम तो महायुद्ध के दौरान पूरे समय तीर्थ यात्रा ही करते रहे !भगवान श्री कृष्ण गीता में १७(२३)में कहा है कि श्रष्टि के आदि काल में ही ओम तत सत इन तीन प्रकार से परमात्मा के नामो का निर्देश किया है ! उसी परमात्मा ने श्रष्टि रचने के प्रारम्भ में ही वेद और वेद ज्ञान को समझ कर साधना से अंतःकरण में धारण करने वाले साधकों की भी श्रष्टि की थी ! इसलिए तीर्थ यात्रा और पावन नदियों के पवित्र जल में स्नान और मंदिर में दर्शन पूजन भारत में अनादि काल से प्रचिलित है !और यह सब कर पुण्य लाभ प्राप्त करने के लिए शास्त्रो में विधान भी बताये गए हैं !इसीलिए तीर्थ आदि की यात्रा में शास्त्र विधान का भी पालन करना चाहिए !ताकि पूर्ण लाभ की प्राप्ति हो सके !
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