प्राचीन भारत में ऋषियों के आश्रम स्वाबलंबी और शक्ति सभी प्रकार के ज्ञान विज्ञान के केंद्र होते थे !उन आश्रमों में ऋषिकुमारों और राजकुमारों सहित समस्त प्रजा जनो को उनकी योग्यता और पात्रता के अनुसार शिक्छण और प्रशिक्छण दिया जाता था !संदीपनी के आश्रम में राज बंशी श्री कृष्णा बलराम और अत्यंत गरीब सुदामा एक साथ एक सा ही शिक्छण बिना किसी भेद भाव के ग्रहण करते थे !गुरु माँ और गुरुगृह के लिए भोजन आदि की सामग्री के लिए कृषि कार्य हवन पूजन और भोजन के लिए गाय की सेवा और उसके चारे तथा सेवा आदि का कार्य !पौधों फलदार ब्रक्छोँ का सिंचन और लकड़ी आदि जंगल से लाने का काम भी श्री कृष्ण और बलराम अन्य छात्रों के साथ मिलकर करते थे !आश्रमों में कर्तव्य पालन की शिक्छा दी जाती थी !ऋषि शस्त्र विद्या में भी पारंगत होते थे !किन्तु स्वयं युद्ध में सम्मिलित नहीं होते थे !महाभारत काल में द्रोणाचार्य ,कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा मात्र तीन ब्राह्मण ऐसे थे !जो शास्त्र और शस्त्र का प्रयोग एक साथ करते थे !भगवान परशुराम ने भी भीष्म पितामह से युद्ध के बाद शस्त्र त्याग कर दिए थे !और उन्होंने कौरव सभा में भगवान श्री कृष्ण के शांति प्रस्ताव का समर्थन भी किया था !संदीपनी को भी भगवान श्री कृष्ण की दिव्यता का ज्ञान था !इसिलए गुरु दक्छिणा में भगवान श्री कृष्णा ने उनके मृत पुत्र को जीवन दान दिया था !उज्जैन नगर जो पूर्व काल में अवंतिका पुरी के नाम से विख्यात रही है !भारत की पुण्यभूमियों में गिनी जाती है !भगवान श्री कृष्णा ने शिक्छण ग्रहणकर इस अनेक ऐतहासिक पौराणिक घटनाओ की साक्छी इस पुण्य भूमि को और अधिक पवित्र कर दिया है
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