भारतीय साधु संतो सन्यासियों पर संपत्ति संग्रह के आरोप इस कारण से अधिक लगाए जा रहे है !क्योंकि वैदिक धर्म संतों के जीवन में सभी प्रकार के शारीरक कार्मिक और वाचिक भोगों को निषिद्ध करता है !जिस व्यक्ति का मन संसार के माया मोह धन बिलास काम सम्बन्धो से मुक्त नहीं है !उसे साधु संत या सन्यासी का वेश धारण नहीं करना चाहिए !किन्तु भारत में जन्मे जैन और बौद्ध धर्म को छोड़ दे जिनमे संन्यास के वैदिक धर्म के समान ही कठोर नियम हैं !इस्लाम और ईशाई धर्मों में इमामों मुफ्तियों मौलानाओ पर इस तरह के प्रितिबंध लागू नहीं है !बे ४ विवाह कर सकते है !तलाक देकर फिर नया विवाह कर सकते हैं !और कितनी भी संपत्ति के मालिक भी हो सकते हैं !उनको माशाहारी भोजन करने की मनाई नहीं है !ईसाई धर्म में कैथोलिक धर्मगुरुओं पर विवाह करने पर प्रतिबन्ध है !वहां नन भी अविविहित जीवन जीती हैं !किन्तु प्रोटोस्टेंट आदि में ये प्रर्तिबन्ध नहीं है !उनके यहां एक नियम ईशा के सामने कन्फ़ेसन का है !जिससे बे पापमुक्त हो जाते हैं ! हिन्दू धर्म में इस प्रकार के विधान नहीं है !साधु संतो सन्यासियों को वैदिक धर्म में पवित्र जीवन जीना पड़ता है!
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