Friday, 4 September 2015

भगवान श्री कृष्णा का प्रागट्य दिवस आज संपूर्ण देश और देश के बाहर के देशों में भी मनाया जा रहा है !भगवान श्री कृष्णा १२५ वर्श धराधाम पर रहे !उनके जन्म से लेकर परमधाम गमन तक एक भी दिन ऐसा व्यतीत नहीं हुआ ! जिसमे किसी न किसी  समस्या से उन्हें जूझना ना पड़ा हो ! सभी प्रकार की भौतिक ,अधिभौतिक और आध्यात्मिक समस्याओं का युगानुकूल समाधान उन्होंने श्री मद भगवद गीता के माध्यम से प्रस्तुत किया है  !गीता वैदिक धर्म संस्कृति के द्वारा संपूर्ण विश्व के लिए भौतिक जीवन के माध्यम से आत्मकल्याण का मार्ग प्रस्तुत करती है !कृष्णा के जीवन का सूत्र रूप में प्रस्तुति करण गीता में हुआ है! !इसीलिए गीता का अमूल्य ज्ञान समाजोपयोगी और आध्यात्मिक जीवन के चरम लक्छ्य की प्राप्ति के लिए  जान ने ओर समझने के लिए व्यास प्रणीत महान ग्रन्थ महाभारत का अध्ययन चिंतन मनन करना परमावश्यक है !महाभारत में संपूर्ण वेदों का गुप्त रहस्य तथा अन्य सब शाश्त्रों का सार संकलित करके स्थापित कर दिया गया है ! केवल वेदों का ही नहीं उनके अंग एवं उपनिषदों का भी उसमें विस्तार से निरूपण किया है ! इस ग्रन्थ में इतिहास और पुराणो का मंथन करके उनका मुख्य रूप प्रकट किया गया है ! बुढ़ापा मृत्यु भय ,रोग और भौतिक  पदार्थों का सत्यतत्व और मिथ्यात्त्व का विशेष रूप से निश्चय और विवेचन किया गया है ! तपस्या एवं ब्रह्मचर्य का स्वरुप, अनुष्ठान तथा उनसे प्राप्त फलों का विवरण ! पृथ्वी ,चन्द्रमा सूर्य, गृह, नक्छत्र सतयुग ,त्रेता ,द्वापर ,कलियुग (वर्तमान युग )इन सबके परिमाण और प्रभाव तथा वेदों के आध्यात्मिक अभिप्राय और अध्यात्म शाश्त्र का वर्णन भी किया गया है ! न्याय, शिक्छा, चिकित्सा, दान आदि के साथ यह भी बताया गया है ! कि देवता ,मनुष्य आदि भिन्न भिन्न योनियों में उनके जन्म का क्या कारण है? लोक व्योहार की सिद्धि के लिए जो कुछ आवश्यक है ! तथा और भी जितने लोकोपयोगी पदार्थ हो सकते हैं  !उन सबका प्रति पादन इस ग्रन्थ में किया गया है ! संसार में जितने भी श्रेष्ठ मार्ग हैं ! और ईश्वर तत्त्व का जो ज्ञान है ! उसका ज्ञान इस ग्रन्थ में भरा पड़ा है ! इस ग्रन्थ में ८८०० ऐसे श्लोक है ! जिनका अर्थ आज भी गूढ़ है बे कूट श्लोक इतने गंभीर अर्थ के है ! कि वर्तमान काल में उनका रहस्य भेदन नहीं किया जा सकता है ! क्योँकि उनका अर्थ भी गूढ़ है और शब्द भी योग बृत्ति और तत्कालीन रूढ़ बृत्ति आदि के कारण अत्यंत गंभीर है ! व्यास जी ने स्वयं कहा है ! कि इन श्लोकों का अर्थ में जानता हूँ  !,शुकदेव जानते है !दिव्य दृष्टि संपन्न संजय जानते हैं या नहीं इस सम्बन्ध में कहा नहीं जा सकता है ? भारत में पिछले १५०० सालों में जिस तरह से वैदिक धर्म संस्कृति को  विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया है !और इसमें अश्पृश्यता ऐसे काल्पनिक आरोप लगाए गए हैं !जो मूलरूप से वैदिक धर्म में थे ही नहीं !जो विदेशी से  आयातित धर्मों के कारण उत्पन हुए !और उनका क्रियानबन भी धर्मभ्रष्ट लोगों ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए किया !और वैदिक धर्मों के सनातन धर्म ग्रंथों में जिस तरह से मिलाबट  की गयी !और कपोल कल्पित  झूठे मनागणित   तथ्योँ का प्रवेश कराया गया है  !उसका स्पष्टी करण महाभारत ग्रन्थ के अध्ययन से स्पष्ट  हो जाता है !विशेष तौर पर शूद्रों का जो स्वरुप आधुनिक समय में प्रस्तुत किया जाता है !उन शूद्रों को वास्तव  में सनातन संस कृति में क्या स्थान था ?और शूद्र किसे कहा जाता था ?इसका पूर्ण विवरण महाभारत ग्रन्थ में देखने को मिलता है !पाराशर गीता में ऋषि पाराशर कहते हैं कि वेद शाश्त्रों के ज्ञान से संपन्न द्विज शूद्र को प्रजापति ब्रह्मा के तुल्य बताते हैं !परन्तु हे राजन! मै तो शूद्र को सम्पूर्णजगत के प्रधान रक्छक भगवान विष्णु के रूप में देखता हूँ !क्योँकि पालन कर्म भगवान विष्णु का ही है  !और शूद्र अपने कर्म पालन कर्ता श्री हरि  की आराधना करके उन्ही को प्राप्त होता है !पराशर गीता पेज ५२०८ शूद्रों को महाधनी भी  कहा गया है ! (३७)६४७९ !युधिस्ठर ने जब राजसूय यज्ञ किया था !तब राज्य  कर्मियोँ को आदेश दिया था कि तुम सभी राज्योँ में घूम घूम कर वहां के राजाओं को ,,ब्राह्मणो, को वैश्योँ, तथा सम्माननीय  शूद्रों  को बुला ले आओ (४१)७६९ !जब पांडव बनबास को जाने लगे तो चारों ओर महलों में रहने वाली ब्राह्मण ,छत्रिय ,वैश्योँ ओर शूद्रों  की स्त्रियां अपने अपने भवनो की खिड़कियोँ से परदा हटाकर दीन पांडवों को देखने लगीं (३१)९३५ !ये कुछ उदाहरण है !इस तरह के अनेक प्रसंग महाभारत में हैं ! जिनमे बताया गया है की शूद्र  किसे कहते थे !और वे क्या कार्य करते थे ?किसी भी घर में राजभवन से लेकर सामान्य जन के घरों में भी पाखाने  नहीं थे !इसिलए मेहतर नाम का कोई वर्ण ही नहीं था !इसिलए वैदिक धर्म संस्कृति की विकृति में एक बड़ा हाथ हिन्दुओं का भी है !और इसका लाभ विदेशी धर्मों ने भारी धर्म परिवर्तन हिन्दुओं का करके उठाया !इसीलिए वैदिक धर्म संस्कृति का मूल महाभारत में है !और जीवन योग गीता में हैं !ये दोनों ग्रन्थ राज प्रत्येक के लिए पठनीय और अनुकरणीय हैं !

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